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बाजारीकृत मीडिया में साहित्य विकसित देश बनने की होड़ में लगे भारत में तेजी से चीजें बदल रही हैं। बढ़ता पूंजीवाद बाजारवाद को जन्म देकर मानवीय- सांस्कृतिक मूल्यों को पीछे छोड़ते हुए एक नये साम्राज्य की स्थापना की कवायद में सक्रिय है। हर क्षेत्र में बाजारीकरण की बू आने लगी है। पूंजीवादी संस्कृति ने जीवन को तो प्रभावित किया ही है, भूमंडलीयकरण, उदारीकरण, बाजारवाद, उपभोक्ता संस्कृति, लोकधर्मिता, सांप्रदायिकता, कट्टरता, आंतकवाद आदि समसामयिक संदर्भों ने जीवन के हर पहलू को प्रभावित किया है। संस्कृति पर तेजी से अपसंस्कृति हावी हो रही है। चीजें अब मेल के रूप में सामने आ गई हैं। ऐसे में पूंजीवाद के झंझावात मेेंं फंसे साहित्य की कसमसाहट भी सामने दिखती हैं। वर्षो से मीडिया में अपनी पैठ बना चुके साहित्य को भी पूंजीवादी संस्कृति ने नहीं बख्शा। व्यवसायिक होती मीडिया ने खबराें को माल की तरह बेचना प्रारंभ कर दिया है ,वहीं पर बदलते परिवेश में साहित्य भी माल बन कर रह गया है और मीडिया साहित्य को भी माल के रूप में ही पेश कर रही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आज मीडिया में 'साहित्य' का बाजारीकरण हो गया है। प्रिंट हो या फिर इलैक्ट्रोनिक मीडिया, साहित्य का दायरा धीरे-धीरे सिमटता ही जा रहा है। पत्रकारिता के इतिहास पर नजर डालें तो साफ पता चलता है कि पहले अधिकांशत: साहित्यिक अभिरूचि वाले लोग ही पत्र-पत्रिकाओं का संपादन कार्य किया करते थे। यही नहीं पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य को खास अहमियत देते दी जाती रही थी। यह कहने से कोई परहेज नहीं है कि पत्रकारिता का जन्म साहित्यिक अभिरूचि का ही परिणाम है। हिन्दी पत्रकारिता के उदय काल में भी ऐसे कई पत्र थे, जिनमें राष्ट्रीय चेतना की उद्बुध्द सामग्री होने के साथ-साथ साहित्यिक सामग्री प्रचुर मात्रा में रहा करती थी। 'भारत मित्र', 'बंगवासी', 'मतवाला', 'सेनापति', 'स्वदेश', 'प्रताप', 'कर्मवीर', 'विश्वमित्र', आदि कई पत्रों में साहित्य को खासा स्थान दिया जाता था। भारतेन्दु काल में ही हिन्दी साहित्य की आधुनिकीकरण की प्रकिया की शुरुआत हुई थी। इसी दौर में हिन्दी पत्रकारिता का विकास उत्तरोत्तर होता रहा। भारतेन्दु जी के संपादन में 'कविवचन सुधा', 'हरिश्चन्द्रचन्द्रिका', 'हरिश्चन्द्र मैगजीन' और 'बाला- बोधिनी' में समसामयिक विषयों के अलावा साहित्य को खास महत्व दिया गया। भारतेन्दु युग में साहित्यिकारों ने पत्रकारिता के माध्यम से साहित्य को दिशा देने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। बालकृष्ण भट्ट ने 'हिन्दी प्रदीप' और प्रतापनारायण मिश्र ने 'ब्राहम्ण' पत्र निकाल कर कार्य को आगे बढ़ाया। वहीं द्विवेदी युग में 'सरस्वती' के बारे में कहा जाता है कि यह साहित्य और पत्रकारिता के एक पर्याय के रूप में सामने आया था। यही नहीं 'सरस्वती' ने साहित्य और पत्रकारिता के मानदंडों की जो पृष्ठभूमि बनायी थी, वह आज भी मिसाल है। 'सरस्वती' ने जो सिलसिला प्रारंभ किया था उसे और व्यापक बनाने में 'माधुरी', 'सुधा', 'मतवाला', 'समन्वय', 'विशाल भारत', 'चांद', 'हंस', आदि पत्रों ने कोई कसर नहीं छोड़ी। आजादी के बाद भी कई ऐसे साहित्यकार सक्रिय रहे जिन्होंने साहित्य के साथ- साथ पत्रकारिता से जुड़ कर साहित्य के प्रचार प्रसार में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया। 'विशाल भारत', 'दिनमान', 'नवभारत टाइम्स' से अज्ञेय जुड़े रहे, तो 'धर्मयुग' से धर्मवीर भारती और 'सारिका' से कमलेश्वर। हालांकि कमलेश्वर 'श्रीवर्षा' और 'गंगा' के भी संपादक रहे। राजेन्द्र यादव 'हंस', रघुवीर सहाय 'दिनमान', भैरव प्रसाद गुप्ता, भीष्म साहनी एवं अमृतराय 'नयी कहानी', शैलेश मटियानी 'विकल्प', महीप सिंह 'संचेतना' मनोहर श्याम जोशी 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' आदि कई चर्चित साहित्यकार हैं जिन्हें साहित्य के साथ-साथ पत्रकारिता के लिये भी जाना जाता है। उस दौर के सारे पत्र बडे पूंजीपति घरानों से ही संबध्द थे और आज भी हैं, लेकिन आज एक बड़ा बदलाव आ गया है तभी तो, 22 वर्षों तक भारत में बीबीसी के संवाददाता रहे वरिष्ठ पत्रकार मार्क टुली कहते हैं कि 'खबरों की जिम्मेदारी बिजनेसमैन के हाथों में हैं। चैनलों, अखबरों पर उनका दबदबा है। आज ताकत संपादक के हाथ में न होकर विज्ञापन मैेनेजर और सरकुलेशन मैनेजरों के हाथ में चली गयी हैं। आज मीडिया भी लाभ कमाने का व्यवसाय बन गया हैं'। बढ़ते खबरिया चैनलों के बीच साहित्य को उतना स्थान नहीं मिल पा रहा है जो आकाशवाणी या दूरदर्शन पर मिलता रहा है। हालांकि इसमें भी गिरावट देखी जा रही हैं। आकाशवाणी से समय समय पर कई साहित्यिकार जुडे। भगवतीचरण वर्मा, सुमित्रानंदन पंत, नरेंद्र शर्मा, फणीश्वर नाथ रेणु, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय आदि कई साहित्यकार हैं जो आकाशवाणी से जुड़े रहे। वहीं, दूरदर्शन पर भी साहित्य की विभिन्न विधाओं का नियमित प्रचार प्रसार होता रहा है। एक समय था जब दूरदर्शन पर भीष्म साहनी की 'तमस' को दिखाया गया तो घर घर में साहित्य की चर्चा होने लगी थी। कई चर्चित साहित्यकारों की कृतियों को लेकर धारावाहिक बनें। जिनमें प्रेमचंद की निर्मला, शरत चन्द्र का 'श्रीकांत', रेणु का 'मैला आंचल', विमल मित्र की 'मुजरिम हाजिर हो', श्रीलाल शुक्ल की 'रागदरबारी', आर.के.नारायणन का 'मालगुडी डेज' आदि काफी चर्चित रहा है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आज उपभोक्तावादी संस्कृति में मीडिया का स्वरूप व्यापक हो चुका है। कभी पत्रकारिता मिशन के रूप में जाना जाता था। आज पत्रकारिता बाजारवाद की गिरफ्त में आकर एक खास वस्तु के रूप में अपनी पहचान बना चुका है। यही नहीं, जनमानस पर इसने कब्जा जमा लिया है। हर वर्ग और सुदूर क्षेत्रों में इसकी आवाज सुनायी पड़ती है। खबर को मसालेदार बना कर बेचे जाने का सिलसिला जारी है। कह सकते है कि मीडिया आज आम खास के बीच घुसपैठ बना चुका है। ऐसे में हर कोई मीडिया प्रेम को छोड़ नहीं पाता है। बाजारवाद की वजह से आम खास होते मीडिया की मोह-माया से साहित्य भी नहीं बच पाया है। साहित्य को आम खास तक पहुंचाने के लिए मीडिया का सहारा लेना पडता है। जाहिर है पत्र-पत्रिकाएं ही साहित्य को आम और खास लोगों तक पहुंचा सकती है। शायद ही कोई ऐसा पत्र हो जिसमें साहित्य किसी न किसी रूप में न छपता हो। इसके बावजूद मीडिया का रवैया साहित्य के साथ अच्छा नहीं प्रतीत होता है। तभी तो समाचार पत्रों के आकलन से साफ तौर पर पता चलता है कि अमूमन सभी अखबार साहित्य की दो से तीन प्रतिशत ही खबरें प्रकाशित करते हैं। जहां तक आज की बात है तो साहित्य मीडिया में केवल फिलर के रूप में दिखता है। खास तौर से प्रिंट मीडिया ने बाजारवाद और उपभोक्तावादी संस्कृति के बढ़ते प्रकोप में साहित्य को माल के रूप में ही रखा है। वर्षो से सप्ताह में साहित्य को पूरा एक पेज देने वाले अखबार अब विज्ञापन को प्राथमिकता दे रहे हैं। विज्ञापन विभाग इतना हावी है कि साहित्य के बने पूरे पृष्ठ को अंतिम क्षण में बदलवा देता है। फीचर संपादक तक को अखबार छपने के बाद पता चलता है कि विज्ञापन या फिर खास प्रायोजित पेज के अंतिम समय में आने के बाद सहित्य पेज को हटाना पड़ा। मजेदार बात यह है कि यह सब कुछ खेल या फिर सिनेमा के नियमित फीचर पेज के साथ कतई नहीं होता है। और यह सब हर स्तर पर छपने वाले अखबारों के साथ होता है। अमूमन राष्ट्रीय और स्थानीय अखबार अपने फीचर पेज में साहित्य से संबंधित सामग्री छापते हैं। मसलन, नवभारत टाइम्स- 'शब्द संसार', हिन्दुस्तान-'मयूर पंख', दैनिक भास्कर- 'वातायान', दैनिक जागरण- 'पुर्ननवा', राष्ट्रीय सहारा-'शब्द मंथन', प्रभात खबर- 'सृजन', आज-'सरोकार' आदि। मासिक-साप्ताहिक व्यवसायिक पत्रिकाएं भी साहित्य को वैसे ही देख रहे हैं जैसे अखबार। इंडिया टुडे का साहित्यिक विशेषांक का लोगों को खासा इंतजार रहता था। पिछले कई वर्षों से उसका भी साहित्यिक विशेषांक नहीं आ रहा है। वहीं पर कई राष्ट्रीय समाचार पत्रों का भी विशेषांक छपना लगभग बंद हो गया है। गिनी चुनी पत्र-पत्रिकाएं ही कभी-कभी साहित्यिक विशेषांक निकालते हैं। पिछले कई वर्षो से अखबारों के चरित्र में व्यापक बदलाव हुआ है। किसी पत्र में रविवारीय परिशिष्ट को अत्यंत ही महत्वपूर्ण माना जाता है जिसमें हर विधा पर सामग्री होती है और उसमें साहित्य को खासा स्थान दिया जाता है। लेकिन आज उसमें भी ठहराव साफ दिखता है। दैनिक हिन्दुस्तान का रविवारीय परिशिष्ट आज भूत-प्रेत, रहस्य, अपराध और सिनेमा को ज्यादा तरजीह दे रहा है साहित्य के नाम पर कुछ भी नहीं रहता है, जबकि पत्र की संपादक खुद एक चर्चित साहित्यकार हैं। यही हालात अन्य पत्रों का भी है। कुछ ही पत्र अपने रविवारीय अंक में साहित्य को स्थान दे पा रहे हैं। बाजार के मुताबिक फिल्म, सेहत, तंत्र-मंत्र, मनोंरजन, अपराध, भविष्यवाणी, और रेसिपी आदि के बढ़ते के्रज के सामने साहित्य दबता जा रहा है। जहां थोडी सी जगह मिल भी जा रही है, उसके संपादक के साहित्य प्रेम को ही आधार माना जा सकता है। एक दौर था जब पत्रों को समाज का प्रहरी, प्रेरक, शिक्षक, मार्गदर्शक और दर्पण जैसे न जाने कितने विेशेषणों से नवाजा जाता था। आज का पत्र निहित स्वार्थो का पोषक बन कर वर्ग हितों का साधक बना बैठा है। ऐसे में साहित्य की धारा को प्रवाहित करने में भला वह रुचि क्यों दिखाये ? अखबारों पर नजर डालने से साफ होता है कि पहले एक पृष्ठ संपादकीय का होता था जिस पर समसामियक लेख होते थे। कालांतर में प्रतिदिन कला-संस्कृति, साहित्य, फिल्म, बाल जगत, स्त्री आदि पर एक एक पेज निकलता रहा। धीरे धीरे एक-एक कर पेज बंद होने लगे और आज ज्यादातर पत्रों में फिल्मी गॉसिप और उपभोक्ता सामग्री छप रही हैं। चर्चित साहित्यकारों के जन्म दिन या साहित्यिक समाराहों को तरजीह नहीं के बराबर दी जाती है। बल्कि पत्र, फिल्मी हीरो-हीरोइनों के विवाह करने, मंदिर जाने जैसी खबरों को खास बनाते हुए पूरा परिशिष्ट ही निकाल देते हैं। अब कमलेश्वर के निधन की खबर को ही लें, कितनों ने खास परिशिष्ट निकाला वह आपके सामने है? इसमें केवल पत्र ही शामिल नहीं बल्कि खबरिया चैनल भी शामिल है। किसी साहित्यकार पर उनका फोकस नहीं होता है। वहीं पर अश्लील और फूहड़ चुटकुलों से लोगों को हंसाने जैसे कार्यक्रम को दिखाने से उन्हें परहेज नहीं है। यों तो साहित्य की खबरें चैनलों पर आती नहीं, आती भी है तो चंद मिनटों में समेट दिया जाता है। कमलेश्वर के साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ वहीं दक्षिण्ा भारत से बिहार के मंदार हिल में बसे स्वतंत्रा सेनानी और चर्चित साहित्यकार आन्नद शंकर माधवन के निधन की खबर जहां समाचार पत्रों में दबे कुचले ढ़ंग से आयी, वहीं चैनलों ने तो नोटिस तक लेने की जहमत नहीं उठायी। जैसा कि ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मराठी कवि वि.वा.शिववाडकर की मृत्यु का समाचार डी.डी.वन पर पंद्रह सेकेंड में समाप्त हो गया था जबकि उसी दिन 10 मार्च 1999 रात आठ बजकर तीस मिनट पर बुलेटिन में सचिन तेंदुलकर के पीठ दर्द का समाचार तीन मिनट चला जिसमें समाचार के अलावा तेंदुलकर के डॉक्टर का बयान शामिल किया गया था। जाहिर है साहित्य नहीं बिकता और जो बिकता है उसे मीडिया तरजीह देने में लगी है। मीडिया द्वारा साहित्य को तरजीह नहीं देने के पीछे साहित्यकारों के खेमें में बंटे रहना भी प्रमुख वजह है, तभी तो चर्चित साहित्यकार डॉ.रामदरश मिश्र साहित्यकारों के साझा मंच बनाने के उठे सवाल पर कहते हैं कि जो लोग वाद, खेमे और झंडे के तहत बटे हैं अगर वे साझा मंच बनाने की बात करते हैं तो ये एक मूल्यवान बात होगी। अपने कहे हुए को करें तो अच्छा है। लेकिन यह संभव नहीं है। डॉ. मिश्र का मानना है कि पिछले 10-20 वर्षों में कविताएं, कहानियां वाद मुक्त हुई हैं और कविता-कहानी बड़ी सहज हो गयी। वहीं नागपुर से डा. ओमप्रकाश मिश्रा के संपादन में प्रकाशित साहित्यिक पत्रिका 'सामान्यजन संदेश' के 75वें विशेषांक अंक में शैलेन्द्र चौहान ने आलेख 'वर्तमान साहित्यिक परिदृश्य' में, खेमों में बटे साहित्यकारों और उनकी सोच पर कटाक्ष करते हुए कुछ साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को साहित्य का ठेकेदार बताया। उन्होंने लिखा है कि देश की चर्चित अनेकों ऐसी साहित्यिक पत्रिकाएं हैं जिनमें आप छप सकें तो चर्चित तो होते ही हैं। मगर इनमें छपने के लिए आपको क्या पापड़ बेलने पड़ते हैं और क्या दक्षिणा देनी पड़ती है, किन विवादों, वादों और विमर्शों की शरण लेनी पड़ती है यह तो आप ही जानें, पर यही आज हिन्दी का बौध्दिक राष्ट्रीय साहित्य है। यह सच है कि खेमें बाजी का खामियाजा नये साहित्यकारों लेखकों को भुगतना पड़ता है। वहीं खेमें में बंटे साहित्यकारों को एक मंच पर लाने को लेकर दिल्ली में हाल ही में जनवादी लेखक संघ के सम्मेलन में विमर्श सामने आया जो एक अच्छी बात है। साहित्य का साझा मंच बनाने पर सभी ने जोर दिया। लेकिन वर्षो से खेमें में बंटे साहित्यकारों का फायदा मीडिया ने भी उठाया है। साहित्यकारों के विचारधारा के मद्देनजर खेमें में बंटे रहने का खामियाजा साहित्य को ही उठाना पड रहा है।
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