बेघर आंखें

भयभीत आंखें! सहमा हुआ चेहरा! शब्दों से बेखबर! वह रसोई के दरवाजे पर आ खडी हुई हैउसका कोई न कोई नाम तो अवश्य होगा इस परेशानी के वातावरण में भी वह क्या सोचने बैठ गया हैपुरुषोत्तम नायर वही नाटक दोहरा रहा है जो कि वह पिछले वर्ष भर से करता रहा है

'' मैं आपका घर ले के भागने वाला नहीं जी हमारे साथ कब्बी बी ऐसा नहीं हुआ जी कि अपुन के साथ कोई झोंपड पट्टी वाले की माफिक बात करे।''

मैं फिर से विचलित हो जाता हूँ। पचास वर्षीय नायर की तीसरी पत्नी, नई नवेली दुल्हन की ओर देखता हूँ। नायर त्रिवेन्द्रम से नया विवाह करके कल ही लौटा है। क्या मैं ठीक कर रहा हूँ ? सूरी साहब को गुस्सा आ गया है, '' शुक्ला जी, तुसी पागल ना बणो। बस तुसी हुण पास्से हो जाओ ए मादर...पिछले तीन महीने से तूने यह क्या नाटक लगा रखा है। भाडे क़ी बात करो, तो आज देता, कल देता।''
''
सूरी साहब मना कौन करता जी, मेरा डिपॉजिट है न आपके पास!
''
तेरी मां । अब्बी कुल मिला कर छह महीने का भाडा हो गया साठ हजार रूपया और तेरा डिपॉजिट है पचास हजार। और उसमें से भी पांच हजार तेरे दलाल ने रख लिया था। उसमें बचा पैंतालीस  बाकि पन्द्रह हजार तेरा बाप देगा?''

क्या क्या सपने दिखा कर बम्बई लाया होगामायावी नगरी बम्बई...पहले ही दिन उसे क्या क्या जलवे दिखा रही हैवह शायद थोडी ही देर पहले नहा कर गुसलखाने से बाहर निकली हैउसके बाल गीले हैं उसने एक प्यारा सा छोटा सा कुत्ता गोद में उठा रखा हैसूरी साहब की घुडक़ी सुन कर कुत्ते को महसूस हुआ कि उस पर दबाव थोडा बढ ग़या है वह घबरा कर अपनी मालकिन की ओर देखने लगा हैमालकिन हिन्दी न जानते हुए भी घटनाक्रम को समझने का प्रयास कर रही है

महेश से अब सहन नहीं हो पा रहा है
सवा छह फुट लम्बे महेश के गठे हुए शरीर की मछलियां उसकी काली टी शर्ट से बाहर फिसलने लगी हैंउसने सीधे नायर का गिरेबान ही पकड लिया हैठेठ मराठी लहजे में शुरु हो गया है,

'' ठॉव हायका तुला, पाटिल मणयातल मला।''
''
मिस्टर शुक्ला, ये क्या बिहेवियर है जी। मिस्टर मेरा गिरेबान छोडो जी।'' नायर पूरी तरह से गडबडा चुका था।
''
ऐकायेबी आईकायच नाहीं माला, समंद सामान अन तला फेकून देईन खाली।''

मैं घबरा कर महेश को अलग करने का प्रयास करता हूँ। महेश मुझ पर नाराज होने का नाटक करता है, '' भाई साब, अब्बी बीच में नहीं बोलने कामां कसम, इसने अगर अब्बी का अब्बी फ्लैट खाली नहीं किया तो इसका सारा सामान चौथे माले से नीचे फेंक दूंगा'' नायर ने ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की थीउसके दिमाग में तो यही योजना उडान भर रही थी कि किस प्रकार फ्लैट को हडप लिया जायेफ्लैट का मालिक तो लन्दन में रहता है, भला उसके पास समय कहाँ कि बम्बई आकर लफडे में पडेउसे पूरी पूरी उम्मीद थी कि वह फ्लैट हथिया लेगाकिन्तु यहां तो पूरा मामला ही पलट गया था

'' शुक्ला जी, आप जैंटलमेन आदमी हैं जी
आई रेसपेक्ट यूअब यह गुण्डा मवाली की माफिक बात करेगा तो ठीक नहीं जी'' नायर का सांस उखडने लगा था, चेहरे पर बदहवासी छा रही थीऔर मैं स्वयं महसूस कर रहा था कि नायर की स्थिति कई स्तरों पर पतली हो रही थी

मुझे अपने स्वर की शालीनता पर स्वयं ही आश्चर्य हो रहा था
'' देखिये मिस्टर नायर, पिछले दो सालों से आप हमें तंग कर रहे हैंअगर पहले से ही आप हमारी बात मान लेते, तो यह हालत हम सब को नहीं देखने पडते'' मैं शायद नायर की कही हुई बात से प्रभावित होकर जैंटलमेन बनने का प्रयास कर रहा था

'' शुक्ला जी, हमको आपके घर में रहने का भी नहीं जी। सच बोलेगा तो, इस घर में कोई है जी, कोई रहता है बहुत तंग करता है जी। हमने कितनी पूजा करवाई जी, मगर कोई फायदा नहीं...रात को जब बेडरूम में सोता जी तो जैसे कोई मेरा गला दबाता जी। हमको ईदर रहने का कोई शौक नहीं जी। इस घर में भूत जी।'' नायर ने बेडरूम की तरफ इशारा करते हुए कहा।

'' अरे नायर, जब तुम उस भूत के पति को इतना परेशान करोगे, तो वो भूत तुमको छोडेग़ा क्या? '' ना जाने यह बात अचानक मेरे मुंह से कैसे निकल गई। लेकिन उसके बाद एक पल भी मेरा व्यक्तित्व वहां मौजूद नहीं रह पाया। रसोई के दरवाजे के निकट भीगी बिल्ली की गोद में डरा सहमा कुत्ता मुझे परेशान करने लगा।

चांदनी भी तो कई बार गुसलखाने से नहा कर यूं ही ठीक उसी स्थान पर खडी होकर मुझे आवाज लगाया करती थी। मैं चाहे कितना भी व्यस्त क्यों न होऊं, उस आवाज क़ो एक बार सुन लेने के बाद काम छोड देना विवशता हो जाती थी। चांदनी  मेरे जीवन में वास्तविकता की खुश्बू भरने वाली चांदनी  मुझ जैसे बेवकूफ इंसान के जीवन में अक्ल का दिया जलाने वाली चांदनी। उस सिंह राशि वाली अप्रतिम सुन्दरी को कर्क रोग ने जकड लिया था। ठीक उसी जगह मेरी गोद में चांदनी ने मौत की हिचकी ली थी, जहां रात को नायर के अनुसार उसका गला एक अज्ञात शक्ति घोंटने लगती है। वही अज्ञात शक्ति कभी मेरे जीवन की सम्पूर्ण शक्ति थी।

पांच वर्षों तक कैन्सर से जूझती चांदनी अपने अंतिम दिनों में बस इसी कमरे में कैद हो कर रह गई थी। अस्पताल से उसके लिये एडजस्टेबल बेड ले लिया था। वह अस्पताल में नहीं मरना चाहती थी। घर में ही ऑक्सीजन, मारफीन और अकेलापन - वह सारा समय दीवार पर लगी काले रंग की घडी क़ो देखती रहती थी। उस घडी क़े डायल में मकडी क़ा जाला बना था और सैकण्ड के कांटे पर मकडी बनी थी। उसी मकडज़ाल में गुम रहती चांदनी। शायद उसे अहसास हो चला था कि वह किस घडी हमारा साथ छोड क़र जाने वाली है।

एक दिन वही चांदनी तस्वीर बन कर दीवार घडी क़े स्थान पर विराजमान हो गई। क्या वही नायर को यहां चैन से नहीं जीने दे रही थी ?

''
अरे, कितनी पूजा करवाई। केरल से पुजारी पण्डित बुलवाये, मगर वो तो जाने का नाम नहीं लेती, अक्खे घर में चलती फिरती दिखाई देती है।''
''
तो घर खाली क्यों नहीं कर देते? पूजा पाठ के चक्करों में क्यों पडे हो? ''

पूजा पाठ से चिन्तित सूरी साहब का फोन लन्दन भी आया था, '' ओ शुक्ला जी, ओ हरामी बडा परेशान कर रिहा है। टेम ते किराया नहीं देंदा जे, ते चक्कर ते चक्कर लगवा रिहा है। मादर...  ने लिविंग रूम दे विच छ: बाई छ: दा इक मन्दिर बनवा लिया जे। रोज पूजा ते पूजा करी जांदा है।''

मैं परेशान, अपनी यादों के ताजमहल से दूर लंदन में बैठावहां की सर्दी में भी पसीना आ गयाअगर उसने अठ्ठारह बाई दस के कमरे में छ: बाई छ: का मन्दिर खडा कर दिया तो मेरा लिविंग रूम लग कैसा रहा होगालेकिन मन्दिर तो मैं ने रसोई में बनवा रखा था, एक छोटा सा लकडी क़ा मंदिर जनार्दन से बनवाया थाउसमें शंकर भगवान से लेकर ईसा मसीह तक को प्रतिष्ठित कर रखा थाफिर नायर को इतना बडा ढांचा लिविंग रूम में बनवाने की क्या जरूरत आन पडी थी?

सुनेत्रा मेरी वर्तमान पत्नी, तो घर किराये पर देने के शुरू से ही विरुध्द थी
वो बरस पडी, '' प ना बस, अपने आप को ही अक्लमंद समझते हैं  वो चन्द्रकान्त आपका सगा हो गया वह है तो दलाल ही नापूरे अस्सी हजार खा गया हमारे एक अनजाने आदमी के हवाले किराया लेने की जिम्मेदारी डाल आये  हमें तो पूरे एक लाख का फटका लग गया नसोसायटी चार्ज दो हजार महीना जेब से गये और अस्सी हजार ऊपर सेजब मेरे लिये कोई चीज ख़रीदनी होती है तो बजट याद आ जाता है''

चन्द्रकान्त! वो अचानक अनजान व्यक्ति कैसे बन गया! जब चांदनी जीवित थी तो भाभी भाभी कहता थकता नहीं था
उसकी पत्नी मेघा तो मुझे राखी बांधने लगी थीअपने लोग कितनी आसानी से धोखा देकर बेगाने हो सकते हैं  यह फ्लैट भी तो उसी ने खरीदवाया थाकितना अपना सा बन गया था सूरी साहब उस समय बिल्डिंग के सेक्रेटरी थेचन्द्रकान्त ही उनसे मिलवाने ले गया थाकितनी बार तो भोजन भी हमारे साथ ही किया करता था'' अरे पूरियां तो भाभी जी बनाती हैं, बसऔर उस पर कद्दू की सब्जी कमाल करती हैं भाभी'' चन्द्रकान्त खाता भी जाता था और चांदनी की तारीफ भी करता जाता थासूरी साहब हमेशा कहा करते थे, ''शुक्ला जी, दलालां नूं एन्नां ज्यादा मुंह ना लाया करोदलाल पहले दलाल ते फेर कुझ होर''

और मैं सूरी साहब को खिसका हुआ माना करता थाचन्द्रकान्त मेरे कहे अनुसार नायर से पैसे तो वसूलता रहा लेकिन उसे मेरे बैंक के खाते में न डाल कर अपने खाते में जमा करवाता रहामैं जब भी लन्दन से फोन करके पूछता, तो जवाब मिलता, '' चिन्ता नको, भाई साहिब भाडा मैं ले आया था''

झूठ भी तो नहीं बोलता थाकिराया तो ले आता था, लेकिन खा जाता था  बंबई के प्रति मेरे सारे भ्रम उसने तोड दिये थेमैं तो घर किराये पर देना ही नहीं चाहता था, बस चन्द्रकान्त ने ही फंसा दिया था'' भाई साहब आप भी कमाल करते हैंसुना नहीं खाली घर भूत का वास घर खाली रखेंगे तो दीवारें तक खराब हो जायेंगी  किराये पर दे देते हैंभाडा हर महीने मैं कलैक्ट करता रहूंगा और आपके बैंक में जमा करवाता रहूंगाकम से कम सोसायटी का तो खर्चा निकलता रहेगा''

काश! यह हो पाता
सुनेत्रा हमेशा कहती है, '' आपको बेवकूफ बनाना तो बहुत ही आसान है बस कोई आपकी थोडी सी तारीफ करदे कि आप कितने अच्छे हैं, कितनी अच्छी कहानियां लिखते हैं, बस हो गये आप उस पर फिदा!  वो पांच हजार मांगे तो बस पकडा देंगे''

क्या बिना विश्वास यह जीवन की गाडी पटरी पर चल सकती है? जीवन में कहीं न कहीं, किसी न किसी पर तो विश्वास करना ही पडता है
किसी विश्वास के तहत ही तो हम अपने बच्चों को उनके स्कूल के अध्यापकों के हवाले कर देते हैंयह भी तो एक विश्वास ही है कि पति पत्नी एक दूसरे को जहर देकर मारने का प्रयास नहीं करेंगे हां जब विश्वास को ठेस पहुंचती है तो दर्द बहुत होता है न!

आज तो आलोक भी यही कह रहा है, '' आप भी कमाल करते हैंमुझे क्यों नहीं सौंपी यह जिम्मेदारीमुझसे कहा होता तो कम से कम यह दिन नहीं देखना पडता'' आलोक चन्द्रकान्त नहीं बन जायेगा, यह भी तो विश्वास की ही बात है नइस मामले में विश्वास तो करना ही पडता हैकिन्तु विश्वास निभाया तो सूरी साहब नेछडे छांट अकेले रहते हैं मजाल है किसी का अहसान रख लें रिटायर्ड जीवन बिता रहे हैं घर में बस एक नौकरानी हैकिसी के जीवन में दखल नहीं देते अपने काम से काम रखते हैंआंख कान खुले रखते हैं सब कुछ जानते हुए भी मस्त मौला बने रहते हैंउनके साथ पहली मुलाकात की यादें बहुत कडवी हैंन जाने कब वे मित्र अन्तत: घर के सदस्य ही बन गयेचांदनी की बीमारी में अस्पताल ले जाने से भी पीछे नहीं हटते थेसही आन बान वाले ठेठ पंजाबी दिल के राजाउनकी कडवी बातों में भी एक सच्चाई होती हैउनका भी यही कहना था कि जब बम्बई छोड क़र लन्दन बसने जा रहे हो तो घर बेच कर जाओउस समय मुझे सूरी साहब पर संदेह हुआ थाक्योंकि फ्लैटों की दलाली ही तो उनकी आय का मुख्य स्त्रोत हैशायद दलाली बनाने के चक्कर में हैंउस समय चन्द्रकान्त बहुत अपना लग रहा थाउसका मीठा अपनापन सूरी साहब के कडवे सच्चे अपनेपन पर विजयी हो गयाऔर पुरुषोत्तम नायर आ बैठा मेरे घर, '' जी, मेरी वाईफ है, दो बच्चे हैंफिल्मों के लिये एक्स्ट्रा सप्लाई करने की एजेंसी है मेरी''

फिल्मी लोगों को तो फ्लैट किराये देने के मैं शुरु से ही विरुध्द था
लेकिन चन्द्रकान्त अपनी लच्छेदार भाषा में मुझे समझा गयाबम्बई से विदा के समय वह अपनी मारुति वैन भी लाया थासुबह साढे चार बजे एयरपोर्ट पहुंचना थावह रात तीन बजे ही घर पहुंच गया
'' चिन्ता तो करने का ही नहीं भाई साहब मैं हूं ना! ''

मुझे किसी काम के सिलसिले में सात महीने पश्चात लन्दन से वापस बम्बई आना पडा
पहला झटका लगा जब बैंक गया चन्द्रकान्त ने बैंक में एक भी रूपया जमा नहीं करवाया थाउससे सम्पर्क किया, फोन उसकी पत्नी ने उठाया, '' अरे! भाई साहब, कैसे हैं आप? अरे,भाई साहब क्या बतायें धन्धे में ऐसी प्रॉब्लम आ गई थी कि आपके पैसे घर में ही खर्च हो गयेअपनी छोटी बहन समझ कर माफ कर दीजियेबस एक डील फाइनल होने वाली है, सबसे पहले आपके ही पैसे वापस करेंगे''  मैं आज तक समझ नहीं पाया कि उस अनदेखे चेहरे की आवाज पर न चाहते हुए भी कैसे विश्वास कर पाया  वैसे यह भी तो सच है कि मेरे पास और चारा भी क्या था? ग्यारह महीने पूरे होने में अभी चार महीने बाकी थेया तो चार महीने का किराया भुला कर किसी और पर विश्वास करता  फिर यह भी तो परेशानी थी कि जिस किसी को बताऊंगा, वही मजाक उडाएगाचन्द्रकान्त को बुला कर पास बिठाया और उसे समझाने की बेकार सी कोशिश करने लगाजिन बातों पर स्वयं अपने आपको विश्वास नहीं था वो भला चन्द्रकान्त को कैसे समझा पाता?

लन्दन में रहने के कारण मेरी सोच में थोडा अन्तर तो आ ही गया था
चन्द्रकान्त से कहा कि भाई हमें अपना घर तो देख लेने दोजरा पुरुषोत्तम नायर से अपॉइन्टमेन्ट तो पक्की कर लो
'' लो आप भी कैसी बातें करते हैं भाई साहब
घर आपका है साला नायर जास्ती चूं चपड क़रेगा तो जूते लगा कर घर के बाहर करुंगा साले को''

फिर भी मैं नहीं माना
पुरुषोत्तम नायर को फोन किया और चार बजे का अपॉइन्टमेन्ट लेकर ही घर की हालत देखने पहुंचाघर के बाहर अभी भी चिरपरिचत सुरक्षा द्वार लगा थादरवाजे पर स्वागत नायर के कुत्ते ने किया थाचांदनी भी तो हमेशा अपने कुत्ते शेरा की बातें किया करती थीजब बचपन कानपुर में बिता रही थी, उन दिनों घर का एक सदस्य शेरा भी थाएक मामले में वो कुत्ता था बहुत समझदारपूरे परिवार में वह चांदनी और उसके पिता से ही सबसे अधिक जुडा थाचांदनी के नेत्र सदा ही शेरा को याद करते हुए सजल हो उठते थेशेरा, जिसे चांदनी गोद में बिठा लिया करती थी, कुछ ही दिनों में इतना बडा हो गया था कि चांदनी को अपनी पीठ पर बिठा कर पूरे घर में घुमा सकता थाएलसेशियन कुत्ता था पूरी तरह से स्वामीभक्त

किन्तु यह कुत्ता तो विचित्र ही था
बस घर में अपने होने भर का अहसास करवा रहा थापूरे शरीर पर इतने बाल कि चेहरे और पूंछ का अंतर ही समाप्त हो गया थाअनजान चेहरे और गंध की उपस्थिति को महसूस कर भौंकना ही उसका काम था

आगे पढें