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प्रेत कामना यह वह एक पल था, जिसे यूं तो सभी लोग एक साथ अपने - अपने तरीके से जी रहे थे पर यह वह पल था, जिसे तीन लोगों ने गहनता से महसूस कर जिया, यूं यह वह पल भी था जो बीत रहा था रेंगता हुआ। यही वह पल था तेज रफ्तार गाडियों के बीच बचता - बचाता जिया जा रहा था। कहीं यह पल चौथाई चांद की पीली मटमैली रात में पेड क़ी फुनगी पर अटका बस टपकने को था। यह पल थाजो रेगिस्तान के कैक्टस में पानी की एक लसलसी बूंद बन कर एकत्र हो रहा था आने वाले सूखे मौसमों की प्यास बुझाने को। दरअसल सलिल के लिये इस अवाक् पल की भूमिका तब बनी, जब वह अपने मल्टीनेशनल कंपनी के दफ्तर से, लिफ्ट से उतर रहा था और उसने लिफ्ट में एक खांसते परेशान अस्थमैटिक बूढे क़ो देखा था। अनायास उसे अपना जनक याद आ गया था। एक बडे फ्लैट में तन्हा।
व्यस्तता की घनेरी परतों
और नई जिम्मेदारियों के भुलावों के बीच खोया हुआ,
उसका कर्तव्यबोध किसी पुरानी पोस्टकार्ड पर लिखी
चिट्ठी सा निकल पडा था और उसे पापा बेतहाशा याद आये थे।
हालांकि वे इसी
शहर में रहते थे।
पर उनसे मिले हुए
उसे आधा साल गुजर गया था।
पिछली बार जब वह
उनसे मिला था,
तब तो वे स्वस्थ ही थे पर उदास थे।
यूं अभी एक साल
ही हुआ है उन्हें रिटायर हुए।
अब वे स्वतन्त्र
लेखन करते हैं।
आज उसे मम्मी भी
याद आ रही हैं कि वे होतीं,
तो शायद वह आज इतना परेशान नहीं हुआ होता।
पर वे तो
वह कांप ही गया था,
अभी कल परसों ही तो एक मैगजीन में पढा था कि एकाकी
विधुर पुरुष कम ही जी पातें हैं।
उनकी बनिस्पत जो
अपने जीवनसाथी के साथ होते हैं या फिर अपने परिवार के साथ। ह्नपापा की चौडी ग़ोरी पीठ पर लिपटी दो नर्म - नाजुक़ बाँहे! उसने तो कभी मम्मी के साथ भी पापा को यूं नहीं कनपटियां गर्म हो गई थीं। अचानक सारा कमरा आउट ऑफ फोकस हो गया। गहरे सन्नाटे में बेसुध सांसे ही इतना शोर कर रही थीं, कि उन दोंनों में से किसी को उसकी उपस्थिति का भान तक नहीं हुआ। वह पल टूटने को ही था - कि करवटें मुखर हुईं, एक सानुपातिक सांवली अर्धनग्न देह दिखने लगी, जो वल्लरी सी पापा से लिपटी थी दो जोडी पैर आपस में उलझे थे। दो जोडी आंखें एक नशे में अधखुली सी उसको देख कर भी नहीं देख पा रही थीं। पापा के चौडे वक्ष के फैलाव में दो सलेटी मांसल उभार पापा के होंठ जिन्हें घनेरी प्यास के साथ सहला रहे थे। जुगुप्सा से उसका जी मितलाया और पापा के उस उदार महान रूप के भ्रम को तोडक़र ही यह पल टूटा। यह पल क्या टूटा एक बची खुची डोर सी टूट गयी, जो उसे पापा के पास खींच कर लायी थी।वह दस दस मन के भारी पैर लेकर जीना उतर कर सडक़ पर आ गया।
एकाएक इस पल की
खिंचावदार टूटन से बुरी तरह आहत हो उसका एकदम से घर जाने का मन जरा भी
नहीं था।
अंधेरे कोने में कार
पार्क कर,
वह फ्लैट के बिलकुल सामने वाले पार्क की एक बैंच पर बैठ,
अपने घर के सिलहट्स देखने लगा।
करीब और दस मिनट
बाद उस बेडरूम की लाईट जली।
जाली के पर्दों
पर उनकी काया उभरी,
उनकी देह से एक ढलते पुरुषार्थ के दंभ का स्त्रोत -
सा फूटता दिखाई दिया।
उसे भान सा हुआ,
जैसे वे उसे ही जता रहे हों कि -
बूढा व अकेला नहीं हूं मैं,
मेरी दुनिया अब भी रस से खाली नहीं।
वह चिढ सा गया।उनकी
परछांई स ही उलझ गया, ''
शोभा देता है यह सब? अब इस
उम्र में? '' तीसरी मंजिल के उस फ्लैट में, जिसे वह अपना घर कहते कहते, अब किसी ओर घर को अपना घर कहने लगा है( यह पापा का घर रह गया है अब) अब हलचलें खामोश हो गईं थीं, उजाला तैर रहा था। वही कमरा जहां मम्मी पूजा करती थीं, सिसकारते अपवित्र अंधेरों के बाद अब जगमगा रहा था। दो परछाईयां फिर खडी होकर उलझीं और ढह गयीं नीचे को। वह दिव्या का कमरा। वह पापा की स्टडीदोनों में अंधेरा था पर अब किचन की बत्ती जली पापा घबरा कर बालकनी में आकर अंधेरों में उसे ढूंढ रहे हैं। दूसरी परछांई घबराई - सी बगल में खडी है। उसने देखा, इस घबराई परछांई से पापा जल्दबाजी में अलग हो, पार्क की गई कारों में उसकी कार ढूंढ रहे हैं, ओह! जल्दबाजी में खाने का पैकेट वहीं छोड आया हूं मैं ! वे दोनों नीचे उतर आये हैं अब और वह एक दरख्त के पीछे आ गया। अरे! यह घबराई सी, हताश परछांई तो जानी - पहचानी है। पापा की दिल्ली वाली रिसर्चस्कॉलर अणिमा। जिसकी बडी आंखों और सांवले रंग की लहराती देह में गजब का जादू हुआ करता था जब पापा जे एन यू में, हेड ऑफ द डिपार्टमेन्ट हुआ करते थे, तब वह बारहवीं में पढता था और अपने दोस्तों में उसके सांवले सौंदर्य की सरस चर्चा किया करता था। ये यहां कैसे? इतने दिनों बाद? ये तो अमेरिका में थी सिमोन द बाऊवार का दूसरा संस्करण! ऐसे ही कुछ लेख लिखा करती थी यह, दिव्या हंसी उडाया करती थी इसकी तो। दादी भी इसके बारे में अच्छी राय नहीं रखती थीं। ऐसी खुली छुट्टी लडक़ियों से लल्ला को दूर रखा कर री बहू। मम्मी हंस कर रह जाया करती थीं। मम्मी पूजा करती थीं पापा की। मम्मी के वही विश्वास और आस्था आज उसके सामने न जाने कितने सालों से यह सब चल रहा होगा! फिर उसकी कनपटी जलने लगी। वह निस्पन्द सा बैठा रहा इधर। उधर पापा थके कदमों से उपर जाकर बॉलकनी में बैठे हैं। वो छूटते पुरुषार्थ का दंभ उनके अन्दर अब दम तोड रहा है। कंधे झुके हैं और वे कांपते हाथों से सिगरेट सुलगा रहे हैं। वह सोच रहा था कि - मेरा अब उनसे यह भी पूछने का मन कतई नहीं करेगा कि कैसे हो आप? अकेले कहां हो आप अब? है न नई दुनिया! जा रहा हूं मैं। वह तेज क़दमों से कार की ओर बढाझटके से स्टार्ट कर बिना आस पास देखे जूऽऽम से कार लेकर निकल गया।
यह वह पहला और आखिरी पल
था अणिमा के लिये -
मुक्ति का, उस लम्बी
प्रेतकामना से मुक्ति का, जो जे एन यू के उन अल्हड दिनों में जब उम्र स्वयं के मूल्य और भविष्य के सपने गढा करती थी। सर ही थे जिन्होंने विचारों की धुंध को दूर कर एक आकार दिया था। एक साफ - शफ्फक व्यक्ति। मानवशास्त्र का महान ज्ञाता एक लेखक एक स्कॉलर। जिनकी परछांई भर छू लेना बहुत होता था। बहुत गर्व था उसे कि वह उनकी रिसर्च स्कॉलर है। दस और भी थे, पर उसे पता था कि वह विशिष्ट है। उनके लेखन की उनकी विरासत सिर्फ उसे मिली थी, उनके साथ कई सेमिनार्स के पर्चे उसी ने तैयार किये थे। वह उन कौरवों पाण्डवों में अर्जुन थी। प्रिय शिष्या! भरोसेमंद जिसे वे अपनी विरासत सौंप कर निश्चिन्त हो सकते थे।
उन्हें डर भी था कि वह
शादी के बाद इस क्षेत्र के प्रति अपना डिवोशन छोड बैठेगी।
और उसने ठान लिया
था कि -
मैं शादी ही नहीं करुंगी और वही समय था कि मैं अर्जुन से एकलव्य बन गई।
वह घबरा गई थी।
हाय! नहीं होगा
उससे यह सब।
मानो वह एक औरत न हुई
कंधों पर हल का जुआ साधे बैल हो गई।
कितने ही
प्रस्ताव उसे स्वयं मिले,
कितने ही मम्मी पापा के जरिये।
बस विवाह के
प्रति उसकी आसक्ति हुई ही नहीं।
उसके लक्ष्य
दूसरे ही थे।
पहले उसके सहपाठी फिर
सहयोगी बने मिलिन्द ने तो कितनी प्रतीक्षा की थी उसकी फिर खीज कर कह ही
दिया था ''
अणिमा तुझ पर तो सर की विशाल, भव्य
बुध्दिमत्ता, उनके यश और व्यक्तित्व की छाया
पड ग़ई है और तू उससे मुक्त होकर ही किसी अन्य के बारे में सोच सकती है।
और नहीं मुक्त
हुई तो टंगी रहना त्रिशंकु सी।
उस खडूस बुङ्ढे
ने ही समझाया होगा कि अणिमा तुम विवाह के लिये नहीं बनी हो।''
उसने कभी मिलिन्द के साथ
प्रेम व्रेम का किस्सा नहीं बुना था,
वो तो स्वयं मिलिन्द और सहपाठी उनकी जोडी बनाते रहते
थे।
हां,
वो दोनों ही बंगाली थे और दिल्ली में परदेसी थे तो
साथ साथ घूमा फिरा करते थे तो एक संभावना साथ जीने की कहीं अंखुआ सकती थी,
अगर मिलिन्द ने उस रोज इतना भला बुरा न कहा होता उसे
और सर को लेकर तो - ''
हाँ,
तीस की उमर में कोई लडक़ी शादी के लिये तैयार नहीं
इसका क्या मतलब है? कि'' वह आहत सी मिलिन्द को देखती रह गई थी। मिलिन्द को वह एक सुलझा हुआ, स्त्री - पुरुष की समानता और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में विश्वास करने वाला व्यक्ति मानती थी। उसका भ्रम टूट गया था। फिर मिलिन्द ने मंजरी से शादी कर ली थी।बहुत बाद में उसने मिलिन्द की बातों पर गौर किया था, तो लगा था कि शायद वह सचमुच सर की बुध्दिमत्ता और महानता की कायल ही नहीं, बल्कि उनसे ऑबसेस्ड भी है। प्रेम तो नहीं था एक अंधी श्रध्दा? कितनी बार अकेले पलों में सर के साथ, अब उसका दिल धडक़ जाता था। पर सर को वैसा ही सहज पाकर धडक़नें संयम की डोरी में बंध जातीं।
दस के दस सहपाठी उसके
युनिवर्सिटी से चले गये।
नये स्टूडेन्ट्स
आ गये।
वह वहीं एडहॉक लैक्चरर
बन गई।
सर का साथ तब तक बना रहा
जब तक कि वे एक प्रोजेक्ट के लिये युनिवर्सिटी की तरफ से तीन साल के लिये
उनके जाने से पहले तीन
बार ये पल जन्म लेने को अकुलाया था।
पहली बार तब,
जब एक सेमिनारमें जाने से पहले उन्होंने अपना पर्चा
अणिमा को पढवाने की बजाय एक नई रिसर्च स्कॉलर को थमा दिया था।
बिफर गई थी वह
मिलिन्द के जलते शब्द अंगारे बन गिर रहे थे उस पर,
बुङ्ढा रसिक है।
हर बैच में से एक
सुन्दर सी कन्या छांट लेता है।
लेकिन सर के पास
जाते ही ऐसा लगा जैसे जलती उंगली बर्फ के पानी में डुबो ली हो।
दूसरी बार वह पल जन्म से
पूर्व ही कालग्रस्त हो गया जब सर ने उसकी मेज पर आकर एक पेपर उसकी ओर
फेंकते हुए कहा था, ''
यह देखो यह पच्चीस साल का प्रोजेक्ट यू एस ए का।
एन्थ्रोपोलोजी तो
ऐसा वास्ट सबजेक्ट है कि इसमें अवसरों की कमी ही नहीं।
आगे रिसर्च करो।
और तुम जैसी जहीन
लडक़ी।
और
यहाँ
एडहॉक बन कर कैरियर
बनाने का क्या मतलब! क्या फायदा हुआ मुझे फिर तुम्हें अपना बेस्ट देने का?
अब
छोडो
यह युनिवर्सिटी बाहर
निकलो दुनिया देखो अच्छे संस्थानों में जाओ।
विदेश जाओ कितने
कितने अवसर हैं।''
तीसरी बार तब
- जब सर की
फेयरवेल पार्टी थी जर्मनी जाने से पहले।
उस बडे
आयोजन
से, पहले
वह उनके साथ थी, उनके ऑफिस मेंदेर तक खामोश। |