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प्रेत कामना

यह वह एक पल था, जिसे यूं तो सभी लोग एक साथ अपने - अपने तरीके से जी रहे थे पर यह वह पल था, जिसे तीन लोगों ने गहनता से महसूस कर जिया, यूं यह वह पल भी था जो बीत रहा था रेंगता हुआयही वह पल था तेज रफ्तार गाडियों के बीच बचता - बचाता जिया जा रहा थाकहीं यह पल चौथाई चांद की पीली मटमैली रात में पेड क़ी फुनगी पर अटका बस टपकने को थायह पल थाजो रेगिस्तान के कैक्टस में पानी की एक लसलसी बूंद बन कर एकत्र हो रहा था आने वाले सूखे मौसमों की प्यास बुझाने को

दरअसल सलिल के लिये इस अवाक् पल की भूमिका तब बनी, जब वह अपने मल्टीनेशनल कंपनी के दफ्तर से, लिफ्ट से उतर रहा था और उसने लिफ्ट में एक खांसते परेशान अस्थमैटिक बूढे क़ो देखा थाअनायास उसे अपना जनक याद आ गया थाएक बडे फ्लैट में तन्हा

व्यस्तता की घनेरी परतों और नई जिम्मेदारियों के भुलावों के बीच खोया हुआ, उसका कर्तव्यबोध किसी पुरानी पोस्टकार्ड पर लिखी चिट्ठी सा निकल पडा था और उसे पापा बेतहाशा याद आये थेहालांकि वे इसी शहर में रहते थेपर उनसे मिले हुए उसे आधा साल गुजर गया थापिछली बार जब वह उनसे मिला था, तब तो वे स्वस्थ ही थे पर उदास थेयूं अभी एक साल ही हुआ है उन्हें रिटायर हुएअब वे स्वतन्त्र लेखन करते हैंआज उसे मम्मी भी याद आ रही हैं कि वे होतीं, तो शायद वह आज इतना परेशान नहीं हुआ होतापर वे तो
उनके रिटायरमेन्ट से करीब चार साल पहले ही नहीं रहीं
बडे चाव से उन्होंने बडा सा फ्लैट लिया था कि दिव्या की शादी इस फ्लैट से होगी, सलिल यहां बहू ब्याह कर लायेगादोनों चाव अधूरे छूट गये दिव्या की शादी हांगकाँग जाकर हुई वह एयरहोस्टेस थी और उसने वहीं अपना दूल्हा ढूंढ लिया था  मम्मी पापा बस रिशेप्शन अटैण्ड कर वापस लौट आये थेसलिल की शादी तो इसी फ्लैट में हुई पर बहू को अपने दफ्तर से दूर मुम्बई के इस पुराने सबर्ब में रहना पसन्द नहीं आया सो वह मम्मी की डेथ से पहले ही उसे लेकर अलग हो गई तब पापा ने कहा था मम्मी से - जाने दो, कुछ कहने की जरूरत नहीं हैबनाने दो उन्हें अपना नीड हम दोनों हैं ना, फिर से अपनी प्राईवेसी एन्जॉय करेंगेउसके चले आने के तीसरे सप्ताह ही, मम्मी की यूं अचानकहुई मृत्यु का अपराधबोध ही सलिल से नहीं छूटता  अब बार - बार मन पापा की ओर भागता है
पिछली बार ही फोन पर कह रहे थे - '' आते जाते रहा करो
पता नहीं कब तक हूं मैं''

वह कांप ही गया था, अभी कल परसों ही तो एक मैगजीन में पढा था कि एकाकी विधुर पुरुष कम ही जी पातें हैंउनकी बनिस्पत जो अपने जीवनसाथी के साथ होते हैं या फिर अपने परिवार के साथ
इतनी लम्बी सोच के ब्रेक भी कार के साथ ही लगे अभी तो बहुत दूर जाना है
वहां से अपने घर भी लौटना है पैंतीस से ज्यादा किलोमीटर का चक्कर हो जायेगाफिर कुछ देर तो ठहरेगा ही क्यों न पापा के लिये और अपने लिये खाना पैक करा लेविम्मी को सैलफोन पर कह दिया कि इंतजार न करे
पापा के फ्लैट में लिफ्ट नहीं थी
समुद्र की ओर मुख किये इन चार माले के पुराने फ्लैट्स में किसी में भी शुरु ही से लिफ्ट नहीं थी पापा तीसरी मंजिल पर रहते हैं सलिल ने महसूस किया यहां पीछे छूट आये समय के टुकडे क़े साथ भी कुछ खास नहीं बदलावैसी ही उमस से भरी नमकीन हवा, वही सोया सा मोहल्लासीले से मकानउन मकानों की चौडी - चौडी बॉलकनी जिनमें बैठ कर उन मकानों के बूढे मालिकों को अपने स्वर्णिम अतीत की यादों की टीस को सहलाना अच्छा लगता हैपापा भी तो उसे वहीं बैठे मिलते हैं, वह जब भी आता हैदूर से उसकी कार पहचान जाते हैं और बच्चे की तरह उत्साहित हो नीचे उतर आते हैं
सामने वही खेल का मैदान ह्न जिसमें आजकल कम बच्चे खेला करते हैं
उनका कितना बडा झुण्ड था अब सब खो गये हैं अपने आशियाने छोड उड ग़ये हैंउसने ऊपर देखा पापा के फ्लैट की बत्तियां कुछ जल रही थीं कुछ बुझी थींटेरेस पर लगा झूला हल्के से हिल रहा था जैसे अभी ही कोई उठ कर गया हो
तेजी से खाने का पैकेट संभाले वह सीढियां चढा
पापा की चिन्ता, पापा की अच्छी बातें जो आज भी उसे कठिनाई में उंगली पकड रास्ता दिखाती हैं, पापा की खामोश मगर बोलती सुन्दर आंखें, पापा की साफगोई, पापा के प्रति एक श्रध्दा व प्यार भरा मोह लिये वह घर के सामने रुकाघर चुप थान जाने क्यों उसे लगा कि अभी ही एक कोलाहल हो होकर ठहरा हैऔर बहुत बहुत सारी बातें करके चुका यह घर अचानक तन्द्रिल हो उठा हैउसने घण्टी न बजा कर, अपनी चाभी से दरवाज़ा खोला, पापा सो रहे होंगे उसने खाना किचन में रखा वहां चाय के दो प्याले रखे थेपापा मम्मी को अब भी बहुत याद करते हैं करके मन भीग गयापापा अब वह पुराना कोने वाला, समुद्र के सामने लम्बी सी खिडक़ी वाला बेडरूम कम इस्तेमाल करते हैंवह स्टडी की तरफ बढा जहां पापा पढते लिखते वहीं सो जाया करते हैंतीसरा बेडरूम दिव्या के लिये है वह जब भी भारत आती है पापा के पास रुकना पसन्द करती हैस्टडी में पापा का ट्रेकसूट कुर्सी पर टंगा था पर पापा नहीं थेबाथरूम भी बाहर से लैच्ड था वह पापा मम्मी के पुराने बेडरूम की तरफ बढा, जिसका दरवाजा आधा भिडा था उसने झांका और वह पल अब सामने था  जीना ही था, इस पल को उसके लम्बे तने खिंचाव के साथ  रबर की तरह खिंचा वह पल टूटने की हद तक पापा!

ह्नपापा की चौडी ग़ोरी पीठ पर लिपटी दो नर्म - नाजुक़ बाँहे! उसने तो कभी मम्मी के साथ भी पापा को यूं नहीं कनपटियां गर्म हो गई थींअचानक सारा कमरा आउट ऑफ फोकस हो गयागहरे सन्नाटे में बेसुध सांसे ही इतना शोर कर रही थीं, कि उन दोंनों में से किसी को उसकी उपस्थिति का भान तक नहीं हुआवह पल टूटने को ही था - कि करवटें मुखर हुईं, एक सानुपातिक सांवली अर्धनग्न देह दिखने लगी, जो वल्लरी सी पापा से लिपटी थी दो जोडी पैर आपस में उलझे थेदो जोडी ंखें एक नशे में अधखुली सी उसको देख कर भी नहीं देख पा रही थींपापा के चौडे वक्ष के फैलाव में दो सलेटी मांसल उभार पापा के होंठ जिन्हें घनेरी प्यास के साथ सहला रहे थेजुगुप्सा से उसका जी मितलाया और पापा के उस उदार महान रूप के भ्रम को तोडक़र ही यह पल टूटायह पल क्या टूटा  एक बची खुची डोर सी टूट गयी, जो उसे पापा के पास खींच कर लायी थीवह दस दस मन के भारी पैर लेकर जीना उतर कर सडक़ पर आ गया

एकाएक इस पल की खिंचावदार टूटन से बुरी तरह आहत हो उसका एकदम से घर जाने का मन जरा भी नहीं था अंधेरे कोने में कार पार्क कर, वह फ्लैट के बिलकुल सामने वाले पार्क की एक बैंच पर बैठ, अपने घर के सिलहट्स देखने लगाकरीब और दस मिनट बाद उस बेडरूम की लाईट जलीजाली के पर्दों पर उनकी काया उभरी, उनकी देह से एक ढलते पुरुषार्थ के दंभ का स्त्रोत - सा फूटता दिखाई दियाउसे भान सा हुआ, जैसे वे उसे ही जता रहे हों कि बूढा व अकेला नहीं हूं मैं, मेरी दुनिया अब भी रस से खाली नहींवह चिढ सा गयाउनकी परछांई स ही उलझ गया, '' शोभा देता है यह सब? अब इस उम्र में? ''
''तो तो क्या करुं
अकेला दम घुटा कर जान दे दूं? मेरा बाकि का जीवन टूटी दीवार से झरते सीमेन्ट सा बीते? यही चाहते हो न तुम?''
'' ''

तीसरी मंजिल के उस फ्लैट में, जिसे वह अपना घर कहते कहते, अब किसी ओर घर को अपना घर कहने लगा है( यह पापा का घर रह गया है अब) अब हलचलें खामोश हो गईं थीं, उजाला तैर रहा थावही कमरा जहां मम्मी पूजा करती थीं, सिसकारते अपवित्र अंधेरों के बाद अब जगमगा रहा थादो परछाईयां फिर खडी होकर उलझीं और ढह गयीं नीचे कोवह दिव्या का कमरा वह पापा की स्टडीदोनों में अंधेरा था पर अब किचन की बत्ती जली पापा घबरा कर बालकनी में आकर अंधेरों में उसे ढूंढ रहे हैंदूसरी परछांई घबराई - सी बगल में खडी हैउसने देखा, इस घबराई परछांई से पापा जल्दबाजी में अलग हो, पार्क की गई कारों में उसकी कार ढूंढ रहे हैं, ओह! जल्दबाजी में खाने का पैकेट वहीं छोड या हूं मैं !

वे दोनों नीचे उतर आये हैं अब और वह एक दरख्त के पीछे आ गयाअरे! यह घबराई सी, हताश परछांई तो जानी - पहचानी हैपापा की दिल्ली वाली रिसर्चस्कॉलर अणिमाजिसकी बडी ंखों और सांवले रंग की लहराती देह में गजब का जादू हुआ करता था जब पापा जे एन यू में, हेड ऑफ द डिपार्टमेन्ट हुआ करते थे, तब वह बारहवीं में पढता था और अपने दोस्तों में उसके सांवले सौंदर्य की सरस चर्चा किया करता थाये यहां कैसे? इतने दिनों बाद? ये तो अमेरिका में थी सिमोन द बाऊवार का दूसरा संस्करण! ऐसे ही कुछ लेख लिखा करती थी यह, दिव्या हंसी उडाया करती थी इसकी तो दादी भी इसके बारे में अच्छी राय नहीं रखती थीं  ऐसी खुली छुट्टी लडक़ियों से लल्ला को दूर रखा कर री बहूमम्मी हंस कर रह जाया करती थींमम्मी पूजा करती थीं पापा की मम्मी के वही विश्वास और आस्था आज उसके सामने न जाने कितने सालों से यह सब चल रहा होगा! फिर उसकी कनपटी जलने लगीवह निस्पन्द सा बैठा रहा इधर

उधर पापा थके कदमों से उपर जाकर बॉलकनी में बैठे हैंवो छूटते पुरुषार्थ का दंभ उनके अन्दर अब दम तोड रहा हैकंधे झुके हैं और वे कांपते हाथों से सिगरेट सुलगा रहे हैंवह सोच रहा था कि - मेरा अब उनसे यह भी पूछने का मन कतई नहीं करेगा कि  कैसे हो आपअकेले कहां हो आप अब? है न नई दुनिया! जा रहा हूं मैंवह तेज क़दमों से कार की ओर बढाझटके से स्टार्ट कर बिना आस पास देखे जूऽऽम से कार लेकर निकल गया

यह वह पहला और आखिरी पल था अणिमा के लिये - मुक्ति का, उस लम्बी प्रेतकामना से मुक्ति का, जो
उसके अवचेतन में अटकी थी
कितना वक्त बीत चला था इस कामना को दफन करके भूल गई थी वोयह कामना एक स्वस्थ सबल कामना थी, जिसे चुपचाप गला घोंट कर दफना दिया था उसने बरसों पहले आज वही प्रेतकामना अवचेतन के विस्मृत गलियारों में भटक - भटक कर चेतन की राह पा गई थीऔर लपक कर इस एक पल में समा गई थी
भारत में मनाये जा रहे प्रवासी सप्ताह के दौरान अगर भारत सरकार के द्वारा उसे सम्मानित किये जाने का आमंत्रण न मिला होता तोयह कामना न जाने कब तक यूं ही आत्मा को क्षरित करती हुई, दफन रहती
कितनी ही बार सपनों में उसने सर की एक अस्पष्ट परछांई - सी के पीछे स्वयं को अनजान गलियों में भटकते देखा हैकितनी बार देखा है उसकी वही ट्रेन छूट गयी है, जिसमें चढ क़र वह उनसे मिलने जा पातीकभी देखा है, उसके कपडे बदलते में अचानक कोई अन्दर बाथरूम में गलती से चला आया है और वह कहती है सरआप? और इन सपनों के मोहनजोदडाे की लिपी से भी कठिन अर्थ खोजने में पसीने पसीने हो हो कर वह रात रात भर जागी है

जे एन यू के उन अल्हड दिनों में जब उम्र स्वयं के मूल्य और भविष्य के सपने गढा करती थीसर ही थे जिन्होंने विचारों की धुंध को दूर कर एक आकार दिया थाएक साफ - शफ्फक व्यक्ति मानवशास्त्र का महान ज्ञाता एक लेखक एक स्कॉलरजिनकी परछांई भर छू लेना बहुत होता थाबहुत गर्व था उसे कि वह उनकी रिसर्च स्कॉलर हैदस और भी थे, पर उसे पता था कि वह विशिष्ट हैउनके लेखन की उनकी विरासत सिर्फ उसे मिली थी, उनके साथ कई सेमिनार्स के पर्चे उसी ने तैयार किये थेवह उन कौरवों पाण्डवों में  अर्जुन थीप्रिय शिष्या! भरोसेमंद जिसे वे अपनी विरासत सौंप कर निश्चिन्त हो सकते थे

उन्हें डर भी था कि वह शादी के बाद इस क्षेत्र के प्रति अपना डिवोशन छोड बैठेगीऔर उसने ठान लिया था कि मैं शादी ही नहीं करुंगी और वही समय था कि मैं अर्जुन से एकलव्य बन गई
 मैं पुरुष होकर अपने लेखन को शादी और इस युनिवर्सिटी की नौकरी के बादज्यादा समय नहीं दे पाता
तुम तो लडक़ी हो शादी के बाद घर - गृहस्थी के झंझट! ''
'' शादी करके अपने लक्ष्य से मैं नहीं भटकूंगी सर
''
'' यह संभव नहीं अणिमा, हर इन्सान को जीवन में एक सोलमेट की जरूरत होती है
नारीवादी होने का अर्थ यह नहीं की पुरुष की आवश्यकता को नकार दिया जाये जीवन से ही, नारीवादिता का अर्थ है, औरत की अपने स्वतन्त्र
अस्तित्व के प्रति सजगता! विवाह अवश्य करना और उस दाम्प्त्य की नींव में एक मजबूत कंधा लगाना और दूसरा बचा कर रखना उस पर रखना नींव अपने स्वतन्त्र व्यक्तित्व की और संतुलन साधे चलाना जीवन
शुरु के सालों में दिक्कत होगी फिर सीख जाओगी विवाह और कैरियर का सन्तुलन साधना''

वह घबरा गई थीहाय! नहीं होगा उससे यह सब मानो वह एक औरत न हुई कंधों पर हल का जुआ साधे बैल हो गईकितने ही प्रस्ताव उसे स्वयं मिले, कितने ही मम्मी पापा के जरियेबस विवाह के प्रति उसकी आसक्ति हुई ही नहींउसके लक्ष्य दूसरे ही थे पहले उसके सहपाठी फिर सहयोगी बने मिलिन्द ने तो कितनी प्रतीक्षा की थी उसकी फिर खीज कर कह ही दिया था '' अणिमा तुझ पर तो सर की विशाल, भव्य बुध्दिमत्ता, उनके यश और व्यक्तित्व की छाया पड ग़ई है और तू उससे मुक्त होकर ही किसी अन्य के बारे में सोच सकती हैऔर नहीं मुक्त हुई तो टंगी रहना त्रिशंकु सीउस खडूस बुङ्ढे ने ही समझाया होगा कि  अणिमा तुम विवाह के लिये नहीं बनी हो''
'' हाय! कसम से मिलिन्द, उन्होंने कभी ऐसा नहीं कहा
पर सच्ची अभी मैं शादी के लिये जरा भी तैयार नहीं''

उसने कभी मिलिन्द के साथ प्रेम व्रेम का किस्सा नहीं बुना था, वो तो स्वयं मिलिन्द और सहपाठी उनकी जोडी बनाते रहते थे हां, वो दोनों ही बंगाली थे और दिल्ली में परदेसी थे तो साथ साथ घूमा फिरा करते थे तो एक संभावना साथ जीने की कहीं अंखुआ सकती थी, अगर मिलिन्द ने उस रोज इतना भला बुरा न कहा होता उसे और सर को लेकर तो - '' हाँ, तीस की उमर में कोई लडक़ी शादी के लिये तैयार नहीं इसका क्या मतलब है? कि''
वह जाने क्या क्या कहता रहा उसके और सर के बारे में उनके साथ साथ दूसरे शहर सेमिनार में जाने के बारे में
सर ही चाहते हैं कि अणिमा विवाह न करे और उनकी  बनके रहे

वह आहत सी मिलिन्द को देखती रह गई थीमिलिन्द को वह एक सुलझा हुआ, स्त्री - पुरुष की समानता और व्यक्तिगत स्वतन्त्रता में विश्वास करने वाला व्यक्ति मानती थीउसका भ्रम टूट गया था फिर मिलिन्द ने मंजरी से शादी कर ली थीबहुत बाद में उसने मिलिन्द की बातों पर गौर किया था, तो लगा था कि शायद वह सचमुच सर की बुध्दिमत्ता और महानता की कायल ही नहीं, बल्कि उनसे ऑबसेस्ड भी हैप्रेम तो नहीं था एक अंधी श्रध्दा? कितनी बार अकेले पलों में सर के साथ, अब उसका दिल धडक़ जाता थापर सर को वैसा ही सहज पाकर धडक़नें संयम की डोरी में बंध जातीं

दस के दस सहपाठी उसके युनिवर्सिटी से चले गयेनये स्टूडेन्ट्स आ गये वह वहीं एडहॉक लैक्चरर बन गई सर का साथ तब तक बना रहा जब तक कि वे एक प्रोजेक्ट के लिये युनिवर्सिटी की तरफ से तीन साल के लिये
जर्मनी नहीं चले गये

उनके जाने से पहले तीन बार ये पल जन्म लेने को अकुलाया थापहली बार तब, जब एक सेमिनारमें जाने से पहले उन्होंने अपना पर्चा अणिमा को पढवाने की बजाय एक नई रिसर्च स्कॉलर को थमा दिया थाबिफर गई थी वह मिलिन्द के जलते शब्द अंगारे बन गिर रहे थे उस परबुङ्ढा रसिक हैहर बैच में से एक सुन्दर सी कन्या छांट लेता हैलेकिन सर के पास जाते ही ऐसा लगा जैसे जलती उंगली बर्फ के पानी में डुबो ली हो
 अणिमा, तुम एनुअल डे की ड्रामा रिहर्सल में व्यस्त थीं
पेपर्स पहले तो तुम्हीं को भेजे थेअब खुद टायप नहीं कर पाता सो श्रुति ने ही किये थे और उसी ने प्रूफ देखे थेअब तुम्हारी कीमती राय के लिये तुम्हारी टेबल पर रख आया हूँ। उनकी हल्की भूरी आंखें, और सिगरेट के निशान से गुलाबी से सलेटी लाल हो आये होंठ संयम के साथ एक अर्थमय मुस्कान मुस्कुराये थेउन्होंने जलन पढ ली थी अणिमा के चेहरे पर ताजा ताजा लिखी

दूसरी बार वह पल जन्म से पूर्व ही कालग्रस्त हो गया जब सर ने उसकी मेज पर आकर एक पेपर उसकी ओर फेंकते हुए कहा था, '' यह देखो यह पच्चीस साल का प्रोजेक्ट यू एस ए काएन्थ्रोपोलोजी तो ऐसा वास्ट सबजेक्ट है कि इसमें अवसरों की कमी ही नहींआगे रिसर्च करोऔर तुम जैसी जहीन लडक़ी और यहाँ एडहॉक बन कर कैरियर बनाने का क्या मतलब! क्या फायदा हुआ मुझे फिर तुम्हें अपना बेस्ट देने का? अब छोडो यह युनिवर्सिटी  बाहर निकलो दुनिया देखो अच्छे संस्थानों में जाओविदेश जाओ कितने कितने अवसर हैं''
'' मैं यहीं ठीक
हूँ।'' उसने सर झुका कर कहा था
'' क्या मतलब?''
'' आपकी छत्रछाया में
'' सर ठठा कर हंसे थे, फिर दर्प और व्यंग्यभरा कमेन्ट किया था'' मेरे यश से कुछ टुकडे यश पाने की आकांक्षा व्यर्थ है अणिमायह तो स्वयं ही अर्जित करना होता हैरही बात मेरे प्रभाव का फायदा उठा कर ही किसी को इस युनिवर्सिटी में लगवाना होता तो अपने बच्चों को न लगवातामैं वैसा नहीं हूँ सॉरी अणिमा मुझसे सिफारिश की उम्मीद मत करना ह्न''
वह फफक कर रो दी थी
'' बस इतना ही समझे न, आप? ''
वह कहते रहे थे -'' ऐसी नारीवादिता का क्या जो पुरुष में अपना सहारा ढूंढे
'' वे कुछ कोमल हो आये थे
जानती थी खूब जानती थी कि अब उनसे छिपा नहीं रह गया था अणिमा की अंधी श्रध्दा का प्रेम में बदलता स्वरूप इसीलिये थी ये कडवी गोलियां
ये दवा में लिपटे तीर!

तीसरी बार तब - जब सर की फेयरवेल पार्टी थी जर्मनी जाने से पहलेउस बडे योजन से, पहले वह उनके साथ थी, उनके ऑफिस मेंदेर तक खामोश
'' अणिमामैं खुश नहीं होऊंगातीन साल बाद लौट कर भी तुम्हें यहां एडहॉक लैक्चरर पाऊं तो! ये प्राध्यापिकी बेकार की निकृष्ट चीज है
आपकी क्रियाशीलता को क्षरित करती है यह आलसी लोगों के लिये है जो बैठ कर मोटी तनख्वाह लेकर खुश रहते हैंतुम उनमें से नहीं  तुममें तो कुछ कर दिखाने का जज्बा था न!''
'' जी सर!''
'' मुझे नहीं पता तुम्हैं क्या रोके हुए है
यहाँ? हर महीने मिलने वाले दस हजार रूपए तो नहीं कम से कमयू डिजर्व मोर! फिर क्या? यहाँ कोई प्रोफेशनल सेटिस्फेक्शन हैमैं यह भी जानता हूँ तुम निस्वार्थ हो तुम मुझसे भी कुछ फायदा नहीं उठा रहीं फिर फिर क्या?''
''''
'' सच कहो अणिमा मैं कई बार डर जाता
हूँ! क्यामैं? ''
''''
'' मुझसे क्या पा सकोगी? कुछ नहीं
मैं चला जाऊंगा परसों''
'' कुछ मांगा क्या आपसे? कहा था न एकलव्य
हूँ ,एक बार ''
'' नहीं यह एकलव्य होना नहीं है यह तो मीराअहिल्या या ऐसा ही कुछ होने जैसा है अणिमा
यह स्वस्थ मानसिकता नहीं है तुम जैसी स्वतन्त्र स्त्री के लिये''
'' मेरा बस नहीं है
''