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स्वांग
वे सुबह - सुबह ही अपना थैला उठाए निकल पडे थेथैला क्या था, भानुमति का पिटारा थाकई दिनों से पीछे पडी थी बीवी सोचा, आज ही क्यों न एक पंथ दो काज ही हो जाएंनए कलेक्टर साहब से भी मिल ही लिया जाएमन में हल्की - सी आशंका कांपी, जैन साहब तो नेक इन्सान थे, खुद ज़मीन से उठ कर फलक पर पहुंचे थे, सो जमीन के आदमियों का गम समझते थेये नया बन्दा जाने कैसा हो?

 

उनका मुहल्ला जहां खत्म होता था, वहां से मुख्य चौराहे तक पहुंचने के लिए दो - ढाई किलोमीटर पैदल चलना होता है, फिर कहीं जाकर एक बडे बरगद के नीचे से बडे सुअरनुमा टैम्पू मिलते हैं, जो सीधे कलेक्ट्री पर उतारते हैंबडे मियां बहुत दिनों बाद अपने घर से निकले थे, सो बादलों के जम कर बरसने के बाद निकली सूरज की साफ रोशनी आंखों को अंधा किए दे रही थीउनके सघन बसे मुहल्ले में सूरज की रोशनी यूं भी खुले दिल से कहां पहुंचती है? रिक्शे लायक पैसे नहीं थे, चौराहे तक पैदल चलना मजबूरी थी

 

कलेक्ट्री पहुंचते ही वे जैन साहब के पुराने पी ए से मिले और देर तक उनसे नए कलेक्टर से मिलवा देने का इसरार करते रहे
'' हमारे सुनने में आया है कि बुर्जुग, एवार्ड मिले कलाकारों को बीमारी - हारी में सरकारी सहायता मिलती है
''

'' मेरी जानकारी में तो नहीं आई ये बात। एक सच्ची बात बताऊं खां साहब, ये जो कलक्टर साहब हैं, वो लोककला -वला की बात नहीं समझते। जवान हैं, तरक्कीपसंद हैं। उन्हें लगता है, सरकार से भत्ता पाते आए पुराने कलाकार, सरकार के लिए सफेद हाथी हैंफिर भी आप जिद पे अडे ही हैं तो मिलवा देता हूँ। आज तीज के कारण कलेक्ट्री में उतनी भीड भी नहीं हैदेखिए आपका काम बन जाऐ तो, मुझे भी सबाब मिल जाऐगाआइए पर्ची बनवा दूँ।''
''खुदा तुम्हें महफूज रखे
''

भीड क़म होने पर भी उन्हें एक घन्टा कलेक्टर साहब के दफ्तर के बाहर पडी, प्लास्टिक की तीन, जुडी हुई लाल कुर्सियों पर पांच और आदमियों के साथ सट कर बैठना पडा
वे कमर में उठती टीस के कारण पहलू बदलते रहे, किसी तरह उन्हें बुलवाया गयादफ्तर की सज्जा एकदम बदली हुई थी
एकदम नई

पुराना पी ए ठीक ही कहता थाजवान लौंडा - सा है यह तो क्या ये सुनेगा उनकी बात?
''बैठिए चपरासी, इनका ये थैला बाहर ही रखो
''
'''' चपरासी थैला लेकर चलने लगा, ' भाई संभाल कर रखना, नाजुक़ चीजें हैं
'
''जल्दी बताओ समस्या क्या है
'' वह कंप्यूटर पर नजर जमाए - जमाए बोलावे अटक - अटक कर अपनी समस्या बताते रहेवह कंप्यूटर में लगा रहा उन्हें लगा कि वह उन्हें सुन भी रहा है कि नहींवे खामोश हो गएतो वह उनसे मुखातिब हुआ
'' देखिए गफ्फार खां साहब, यही नाम है न आपका?'' उसने चिट पर नजर डाली
''आपकी तीन महीने की रुकी पैंशन तो मिल जाऐगी, मगर इलाज का पैसा, या आर्थिक सहायता जैसा कोई प्रावधान हमारे जिले में अब तक तो नहीं आया है, न ही बजट में इतनी गुंजाइश हैक्या आपको पता है, इस जिले में आप जैसे बूढे, पैंशनयाफ्ता करीब तीन हजार कलाकार होंगे, जो राजमहल के गुणीजनखाने की शरण से निकल कर हमारी गरीब सरकार की झोली में आ गिरे हैं ऐसे - ऐसे कलाकार, जिनकी बूढी, मरती हुई कलाओं का कोई नामलेवा तक नहींजिनके बच्चों तक ने उनकी कला को बेकार समझ के छोड रखा हैआज के तरक्कीपसन्द युग में कला के क्या मायने, वह भी राजा - महाराजाओं के जमाने की कलाएंआप ही कहें आपके बच्चों में से कौन आपकी विरासत को आगे बढा रहा है? न सही बच्चा, है आपकी कला का कोई नामलेवा कोई चेला?''

मुंह उतर गया था, गफ्फार खां काथूक गले में गटकते हुए बोले _

ठीक कहते हैं साहब, कोई नहीं है हमारी कला का नामलेवा, न कोई बच्चा, न चेलावो जानते हैं, अहमक थे उनके बुजुर्ग़कला के लिए गलते रहे ताउम्रउनकी नजर में हमारी ये कला गले पडी अधेड रखैल हैफिर भी आप कुछ दिलवा सकें हमारे इलाज के लिए सरकार से तोमेहरबानी''
''मैं ने कहा न कलाकारों के इलाज के लिए आर्थिक सहायता का कोई सरकारी प्रावधान नहीं है
  वैसे आपको हुआ क्या है?''

उन्होंने ठण्डे शब्दों में बीमारी का नाम बता दिया
''ओहह! मेरे मातहत करीब सौ लोग हैं, कहें तो सबसे 10 - 10 रूपए चन्दा करा दूं
''
वे चुपचाप उठ गए कुर्सी से और सलाम करके बाहर चल पडे
उनकी देह एक बूढी सदी की तरह लग रही थीजो चुपचाप गुजर रही हो, बिना आहटों केवे पुराने पी ए से नजर बचा कर कलेक्ट्री से बाहर आ गएउन्हें आगे जाना था

तीज का दिन था
हरियल, गुनगुनी आंच से भरा - भराशहर के गुलाबी परकोटे, गुलाबी भवन, दुकानें, मंदिर भीग कर नए से दिख रहे थेबारिश की फुहार से सारा शहर भीग कर बस सूखा ही था, और हल्की धूप में एक सौंधी सी भाप छोड रहा थाखासा कोठी में पर्यटन विभाग वालों ने मेले का आयोजन किया थादेसी - विदेशी टूरिस्टों को आकर्षित करने के लिए, ये हर साल ऐसा मेला करते हैंबहुरूपिए, भवाई, गैर, घूमर, भोपा - भोपी,कालबेलिया नृत्य करने वाले नर्तकों, मंगनियार और लंगा लोक गायकों की टोलियां की टोलियां राजस्थान के दूर दराज हिस्सों से जैसे यहीं आ जुटती है

फिर पर्यटन विभाग के इन मेलों में 'पैसा' बहुत बडा आकर्षण होता है लोककलाकार के लिएसरकार से पैसा तो मिलता ही है, लोगों से बख्शीश में रूपया तो रूपया, कभी - कभार 'डालर' भी मिल जाता हैतफरीह होती है सो अलग

 

खासा कोठी के मेहराबदार द्वार पर ठुमकने वाले घोडे अौर ऊंट, सवारी कराने वाले हाथी ऐसे झूम रहे थे कि जैसे किसी रावले के कुंवर का विवाह ही होने जा रहा होरंगीन साफा बांधने वाले, मेंहदी लगाने वाली लुगाइयां, घेवर बेचने वाले, कोल और पेन्सिल से महलों - बावडियों के रेखा - चित्र बनाने वाले, छायाकार, टूरिस्ट गाइड, पर्यटन पर निर्भर रहने वाले बहुत से व्यवसायों के लोग आ जुटे थेएक हरे - भरे कोने में औरतों के लिए नीम के पेड क़े ऊंचे मोटे मजबूत तने पर झूला डाला गया थाउसे गेंदे के फूलों से सजाया था, जिस पर कसूमल घाघरों - और हरी - पीली लहरिया की ओढनी ओढे रतें पींगे बढाती हुई लोकगीत गा रही थीं
_ म्हारी बनी ने झूलन दीजो, बना छैल भंवर सा

 

मेला पूरे उफान पर था, शहर के ऊंचे तबके के लोग भी खिंचे चले आए थेउनमें कुछ मंत्री व उनके परिवार, व्यवसायी, शाही परिवारों के  रिश्तेदार, कुछ विशिष्ट विदेशी मेहमान प्रतीत हो रहे थेखासा कोठी के बगीचे में छतरियों के नीचे धूप सेकते हुए, अलग - अलग समूहों में बैठे थे और ठण्डी बियर का आनन्द ले रहे थे, क्योंकि राजमहल से निकलने वाली तीज माता की सवारी यहां से भी देखी जा सकती थीमगर वे मेले की चहलपहल से दूर खासाकोठी के लॉन में बैठे थेलोक - कलाकारों और मध्यमवर्गीय मेला - दर्शकों से कुछ हटकरयह जताते हुए, जैसे कि वह मेला मध्यमवर्गीय लोगों और देसी - विदेशी सैलोनयों के लिए है, उन्हें यह सब देखना होता है तो वे व्यक्तिगत तौर पर अपनी हवेलियों या बंगलों में लोककलाकारों को बुलवा कर आयोजित करवा लेते हैंखासाकोठी के कर्मचारी अतिरिक्त सौजन्यता से उनकी आवभगत में लगे थे

 

एकाएक इन सभ्रान्त लोगों के एक समूह के बीच से शोर उठा'' अरर हटभग यहां से नहीं चाहिए ये सबउठती है कि ''

अचानक रंग में भंग डालने को, उन के बीचों - बीच एक मोटी, गाडियालोहारन, अपने पीले दांत दिखाती हुई, चिमटे, दरांती, खुरपी बेचने चली आई थीकत्थई और काला, टखनों तक उंचा, फटा घाघरा पहने इस औरत का मोटा पेट बाहर को निकला थावह रह - रह कर अपनी जांघे खुजाती और घाघरा उठा लेतीइन लोगों को जुगुप्सा होने लगी वो उसकी गन्दी वेशभूषा से घृणा कर रहे थेकभी वह किसी संभ्रान्त व्यक्ति से सोफे पर सट कर बैठ कर खुरपी खरीद लेने की गुजारिश कर रही थी, कभी एक अंग्रेज महिला के सामने जमीन पर बैठ कर हाथ चला - चला कर मोलभाव कर रही थीडरा - धमका कर भगाए जाने पर भी वह उठ कर भद्दी कामुक मुस्कान देती, भारी छातियों को हिलाती, चोली ठीक करती हुई, उनसे सामान खरीद लेने का इसरार करती रही

'' ऐऽ जाती है कि बुलाएं पुलिस को। आयोजकों से शिकायत करो मेले के नाम पर कैसे - कैसे लोगों को सीधा ऐसी जगहों में घुसने देते हैं, कोई सुरक्षा - व्यवस्था है भी कि नहीं।ये पुलिसवाले बैठ के बस नाच ही देख रहे हैं क्या?'' एक अधेड व्यक्ति चीखा।

इस पर वह अपनी मोटी आवाज क़ो दुगना ऊंचा करके चीखने लगी और अपनी भाषा में इस आशय में विलाप करने लगी कि ''बुला लो, बुला लो पुलिस को यहा इतने बडे - बडे लोग हैं, हमारी दशा पर तरस खाने वाला कोई नहीं, अरे! ये नहीं बेचूंगी तो शाम को चूल्हा कैसे जलेगा, मेरे सात बच्चे और दो - दो शराबी पति खाएंगे क्यानेता और बडे - बडे अफसर मजे क़र रहे हैं और हम जैसे गाडियालोहार लोग भूखे मर रहे हैं''

 

शोर सुन कर राजस्थान पर्यटन विभाग का एक वरिष्ठ कर्मचारी लगभग दौडता हुआ चला आयाआते ही उस गाडियालोहारन को देखकर मुस्कुराने लगाउस मोटी गाडियालोहारन के अश्लील और बेहूदा व्यवहार से क्षुब्ध लोगों को गुस्सा आ गया'' आप हंस रहे हैं? ''

'' बात तो हंसने की ही है ना, सर।''
''
घणी खम्मा हजूर। आप पहचान गए।'' अब तक गाडियालोहारन सौजन्यता पूर्ण मुस्कुराहट देकर इन महाशय को अभिवादन कर रही थी।

सभ्रान्त स्त्री - पुरुषों का वह समूह हैरान - परेशान सा उन महाशय का मुंह देख रहा था

''सर ये, हमारे राज्य के राष्ट्रपति पुरस्कार प्राप्त 'बहुरूपिया' कलाकार गफ्फार खां हैं।''
एक ठहाका बुलन्द हुआ और गफ्फार खां अपनी गुस्ताखी के लिए क्षमा मांगने लगे। उन्हें उनके स्वांग के लिए सबसे बहुत प्रशंसा मिलने लगी, जिसे वे झुक कर स्वीकार करते रहे।

 

आज बहुरूपिया कला लगभग विलुप्त प्राय: हैउत्तरभारत के अधिकांश राज्यों में यह कला कभी समाज का अहम् हिस्सा हुआ करती थीलोगों के मनोरंजन और कला के जरिये जीविकोपार्जन करने वालों के लिये आय का साधन थीआये दिन मुहल्लों में कभी कोई पुलिस - चोर चले आ रहे हैं, अपने मजेदार सम्वादों के साथ, कभी सेठाणी से सडक़ पर पिटता सेठ, कभी नर्तकी, तो कभी डॉक्टर तो कभी नेता, कभी मोटी लडाक भटियारिनकभी दरवेश तो कभी शिव या हनुमान बन ये कलाकार कुछ पैसों या दो कटोरी आटे के बदले घर के काम - काज से ऊबी गृहणियों के लिये, गली या मोहल्ले के चौक में ही मनोरंजन जुटा देते थेखिडक़ी से झांक या गलियारों, अहातों, छतों पर आ कर वे कुछ पल हंस लिया करती थीं और दान का पुण्य भी उठा लिया करती थींये उस जमाने के नुक्कड नाटक हुआ करते थे जिनमें समाज प्रतिबिम्बित हुआ करता था

 

पांच सौ रूपए की बख्शीश पाकर गफ्फार खां संतुष्ट हो गएकलाकारों को बख्शीश देना राजस्थान के सभ्रान्त वर्ग की परंपरा रही हैबख्शीश की गुनगुनी आंच में सामन्तवाद की बू जाने कहां बिला
गई
  'खम्माघणी हजूर, आप लोगां री दया सूं ई म्हारी कला जीवती है, दस साल पैले 'राष्ट्रपति सम्मान' देवा रे बाद, कोई चिडि रो पूत पूछवा कोनी आयो के गफूरिया थूं जीवतो है कि मरी ग्योआज के मैंगाई रे जमाना में 300 रूपिया महिना री पिंशन सूं कांई व्है?'

बूढे लोककलाकार गफ्फार खां की इस बात से कुछ लोगों के मुंह बन गए, बियर का नशा उतर गया और बढिया खाने का स्वाद कसैला हो गयामगर वे अपने में मगन मेले की रौनक की तरफ बढ ग़ये

 

दोपहर बीत चली थी, वे घर से लाए एक स्टील के टिफिन में रखे परांठे और सब्ज़ी खाने लगेधूप में तेजी आ गई थीउनके मेकअप की मोटी परत में दरारें पडने लगी थींवे मुंह धोना चाहते थे मगर

'' आठ सौ रूपिया टूरिश्ट डिपार्टमिन्ट से, पांच सौ ये, अभी तो मेला जमा है। अंग्रेज़ भी हैं, थोडा और जुड ज़ाए'' मन ही मन वे हिसाब लगाते हुए, वे धीरे - धीरे एक तम्बू में रखे अपनी पोशाकों के थैले की तरफ बढे। थैला पुराना था, उसमें रखी पोशाकें उससे भी पुरानी। कुछ तो अब जिस्म पर अंटती  ही नहीं। उन्होंने तम्बू में लगी ओट के पीछे जाकर कपडे बदले। मेकअप बदला सब कुछ महज पांच मिनट में। अबकि वे अधेड महिला कान्स्टेबल बन कर डण्डा घुमाते हुए कुछ कॉलेज के युवाओं के झुण्ड की तरफ बढे  '' , इधर लडक़ी - वडक़ी नहीं छेडने का समझे। मैं कमला कानस्टेबल। लडक़ी छेडी तो अन्दर। उन्होंने अभी स्वांग की भूमिका रची ही थी कि तेज रफ्तार गाने का शोर उठा, सारे युवा उधर को खिंच गए। जरा से लोग खासा कोठी के चौक में खडे उकताए से उनका स्वांग देखते रहे फिर वे भी इधर - उधर हो गए। वे अकेले ठिठके - से खडे रह गए। फिर उधर ही बढ ग़ए जहां भीड थी।

 

कालबेलिया नर्तकों के टोले की दो छोटी लडक़ियां अपनी अद्वीतिय लचीली, विद्युतीय तेजी वाली घेर - घुमेर से दर्शकों को आकर्षित करने में लगीं थींगैर नृत्य में डण्डों का एक साथ ताल में उठना, बजना, घूमर में घूंघट डाले औरतों का एक घेरे में घूमना, भवाई नर्तक का मटकों के ऊपर मटके रख कर कील पर चलना भी दर्शकों को रोक कर नहीं रख सकावे कालबेलिया नृत्य करती इन लडक़ियों की लचीली देह के, तेज रफ्तार नृत्य के साथ - साथ अंखडियों और दांत के नीचे दबे होंठ के लास्य में आ उलझेपीछे को झुक कर दोहरी होकर एक साथ सौ चक्कर घूम जाती ये लडक़ियां मानुस नहीं नागिन की संताने लग रही थीं 'अररर र इंजण की सीटी में म्हारो मन डोले चल्ला चल्ला रे डलैवर गाडी हौले होले'

बढती भीड क़ो देख कर एक मुख्य नर्तकी उठीउसने अपना घाघरा झाडानाडे में लगे आईने के टुकडे में झांक कर ओढनी से आंखें साफ कीं, होंठों पर जबान फिराईगाल पे लटके बालों में उंगलियों से घूंघर लपेटेकुर्ती में नीचे भीतर हाथ डाल कर कांचली नीचे खींचीउसकी इकहरी - पतली लचकदार देह पे सजा था, काला, खूब घेरदार घाघरा, जिसकी घेरदार परतों में बीच - बीच में लाल, नीली, पीली और रूपहले रिबन से गोट लगी थी और लगे थे,गोल - गोल शीशे काली कुर्ती, कुर्ती के भीतर काली ही कांचली, काली ही रूपहली गोट वाली ओढनी, चौडे माथे पे सर्पिलाकार काली बिन्दी, काली कजरारी मोटी आंखे, गहरे कत्थई मोटे, गोल, भरे - भरे होंठगोल छोटी नाक और देह की जैतूनी रंगत मानो उसकी यह जैतूनी रंगत ही उसकी बहुमूल्य पोशाक थी और उसकी देह का लास्य उसका बेशकीमती गहनाउसने रंगीन छोटे मोतियों के सस्ते जेवर, नाक में चांदी की नथ पहनी हुई थीचेहरे पर बहुत से गोदने थे, उसकी बडी ंखों की कोरों पर भी तीन नीले फूल गुदे थेउसकी देह से, उसके खडे होने के ढंग से अद्भुत नर्तकी होने की महागाथा फूटने लगीहर अंग - अंग ऐसे कंपन से भरा कि सभ्रान्त औरतों की संजीदगी उसके आगे पानी भरे

पुंगी और खंजडी लेकर एक अधेड र एक किशोर संगत कर रहे थे और दो कालबेलिया लडक़ियां गा रही थीं, एक गाना खत्म कि दूसरा शुरु -- रे काल्यो कूद पडयो रे मेला में सायकल पंचर कर लायो

 

'म्हारो अस्सी कली को घाघरो' की टेक के साथ वह मुख्य संपेरन नर्तकी उन दो लडक़ियों के बीचों - बीच जा बैठी, पहले घुटनों के बल बैठ कर ओढने का घूंघट बना कर गुडिया की तरह अपनी गर्दन जल्दी - जल्दी मटका कर देखने वालों पर मुस्कान भरे कटाक्ष फेंकने लगी। फिर जैसे ही गाने की लय तेज हुई, उसने एक तरंग के साथ जिस्म लहराया और  हाथ फैला कर पीछे को झुकती हुई घूम गई। उसके घूमते ही उसकी गर्दन रबर की गुडिया की तरह पलट कर दूसरे कंधे पर आ टिकी। एक जादू - सा हुआ। उसके पैर और गर्दन समानान्तर एक लय पर घूमते हुए एक चाप बना रहे थे, कमर और हाथ उसी लय की द्रुत ताल पर, समानान्तर। पूरे नृत्य के दौरान लय और ताल का सम्मोहक सम्मिश्रण और बीच - बीच में आंखों और मुस्कान का विलास, जब वह दांत खोल कर मुस्कुराती तो दांत में जडी सोने की कील चमकती। जब वह नैनों की कटार साधती, आदमी तो आदमी औरतों के कलेजे हुमक उठते। लोगों के रौंगटे खडे हो जाते। एक अमरीकी ने अपने दोस्त को अपना हाथ दिखाते हुए कहने लगा _ '' लुक गूज पिंपल्स।''
सच में गोरे के हाथ के सुनहरे रेशे खडे थे और त्वचा के रोम उभर आए थे।

 

वह हर चक्कर के साथ केंचुल छोडती नागिन - सी लग रही थीकेंचुल! जिसमें से वह एक नया, मारक रूप लेकर बाहर निकलतीसम्मोहकहद तो तब हो गयी जब उसने हंसते हुए अपनी अनामिका उंगली से चांदी का छल्ला उतारा और घास उगी जमीन पर रख दिया घूम - घूम कर चक्कर खाते - खाते, वह पैरों को एक फासले पर जमा कर खडी हुई और ताल के साथ ठुमकते हुए देह को पीछे को झुकाने लगी, यहां तक कि गर्दन उसके पैरों से जा लगी, मगर उसकी देह इस दोहरी अवस्था में भी ताल पर थिरक रही थीअब वह और झुकी, पहले गर्दन ज़मीन के समानान्तर थी, अब माथा जमीन को छू रहा था, उसने थोडा और अपने शरीर को धनुषाकार झुकाया और अपनी लम्बी - लम्बी पलकों से वह अंगूठी उठा लीतालियों की गडग़डाहटों से खासा कोठी गूंज उठीबाकि दो लडक़ियां अपना नाच रोक कर डफ उठा कर भीड से बख्शीश मांगने लगीं, खुश होकर लोगों ने बहुत से पैसे उस डफ में भर दिएएक विदेशी छायाकार जो पूरे नृत्य को शूट कर रहा था, उसने सौ डॉलर का नोट उसमें डाल दिया

 

गफ्फार खां मन ही मन कुढ ग़एये साली कालबेलिया, खानाबदोश औरतें आज लोककला के आकाश पर हैं और हम जैसे धूल चाट रहे हैंमगर खुदाकसम, नाच सच में कमाल थागफ्फार खां को अपने बीते हुए दिन याद आ गएक्या मजमा जमता था, जब वे शहर की प्रमुख रामलीला के मंच पर नाचते थे 'कंकरिया मार के जगाया, हाय वो मेरे सपनों में आया, बालमा तू बडा वो है'' तब के मुख्यमंत्री साहब को तो यकीन ही नहीं हुआ था कि वह औरत नहीं, मर्द है, वह भी दो बच्चों का बापउन्हें बुलवा कर इनाम दिया और कहा था _'' शाबाश, गफूरिया''
वह होंठ का कोना दबा कर मुस्कुराते हुए अपनी अनामिका में डला छल्ला घुमाते हुए हंस दिये थे

 

उन दिनों एकदम खुलता हुआ रंग हुआ करता था उनका, उस पर मेकअप की वो - वो बारीकियां जो उनके उस्ताद उन्हें सिखा गए थेउनके उस्ताद ने कभी 'लक्टाकलमान'( लेक्टोकैलेमाइन) या ग्लीसरिन और जिंक का मिक्सचर नहीं लगाया था, हमेशा मुल्तानी - मिट्टी, चन्दन का ही बेस लगाते थेगाल पर लाली की जगह गुलाब - हल्दी से बना पावडर मलते, काजल और भवें सलाई से रचातेलिप्सटिक की जगह अखरोट की छाल मलतेहालांकि खुद उन्होंने जिंक और 'लक्टाकलमान' और तरह - तरह के रंग अपना लिए थे धीरे - धीरे, क्योंकि पुराने तरह के श्रृंगार में मेहनत बहुत थी, पर सच पूछो चमडी ख़राब तो नहीं होती थी, इन नामुराद चीजों से बडी ख़ुजली होती हैलेकिन उस्ताद जब मरे तब भी उनका चमकता चेहरा, उनके अखरोट की छाल से रंगे होंठ और सुरमा लगी बन्द पलकें ह्न ऐसे लग रहे थे कि सेज पे सोयी सुन्दरी का कोई लम्बा स्वांग ही रचे जा रहे हों उनकी मौत बडी क़लात्मक लगी थी उन्हें उनकी यह कलाकाराना मौत उन्हें भीतर से तन्हा कर गई थीउस्तादनी ने भी उनसे मुंह फेर लिया था, जैसे उनकी वजह से ही मौत हुई हो _ बात बहुत पुरानी है