एक नदी ठिठकी सी - 2

एक रात न उसका पेन्टिंग में मन लगा ब्रश के एक दो स्ट्रोक्स लगा कर उठ गई, न ही नॉवेल में कोई थ्रिल लगा, टी वी के भी सारे चैनल बदल डाले कहीं मन न लगाघबरा कर छत पर आ कर आकाशगंगा देखने लगी , सफेद दूधिया घनेरी निहारिकाहर भाषा में इस अद्भुत दूधिया लहर का कोई न कोई नाम है, कहकशाँ, मिल्की वे या गैलेक्सी यानि बरसों से मानव इससे आकर्षित रहा है।  

तभी फोन बजाओह! लगता है कल का ऑफ गया, वह तो लतिका के साथ कुम्भलगढ क़े किले को देखने जाने वाली थी ।  कोई भी लोकल स्टाफ न आए तो केतकी को पकडो, जिसकी न गृहस्थी न रोज बीमार पडते बच्चे।  

'' हलो ''
''
हलो केतकी पार्थ... ''
''
सर... '' केतकी सचमुच चौंक पडी।
''
तुमने फोन पर मुझे एक्सपेक्ट नहीं किया होगा न? ''
''
हाँ नहीं सर.. ''
''
तुम्हारे ऑफिस से लिया था तुम्हारा नम्बर। ''
''
कहिये सर... ''
''
कल मैं अपने कुछ पर्सनल दोस्तों को इनवाइट कर रहा हूँ। तुम आओगी? ''
''
सर.. मैं... मेरा वहाँ होना आपके अपने कुछ पर्सनल दोस्तों में? ''
''
केतकी अब तो छोड दो ये सर कहना। ''
''
पार्थ मैं नहीं आ सकूंगी। ''
''
वजह ? ''
''
मैं दोस्त तो क्या आपको ठीक से जानती तक नहीं, पहले ही लोग मेरी इतनी चर्चा करते हैं अब आप मेरा जीना मुश्किल करेंगे क्या ? ''
''
यू आर टू मच केतकी , नहीं जानती तो अब जान लो। मैं शहर का एक महत्वपूर्ण व्यक्ति होने के अतिरिक्त एक जीवंत व्यक्ति हूँ। विवाहित हूँ, दो स्कूल जाते बच्चों का पिता, मेरी पत्नि भी आइ ए एस ऑफिसर है वह बच्चों के साथ बेंगलोर में रहती है। यहाँ मेरा एक छोटा सा सर्कल है दोस्तों का जिसमें सभी आइ ए एस ऑफिसर्स नहीं और सभी पुरूष नहीं। कलाकार हैं, लैक्चरर हैं, व्यवसायी भी।  तुम क्या समझती हो मुझे और अपने आपको? ''
''
पार्थ सुनो तो। ''
''
तुम्हारी वो पेन्टर दोस्त है न... ''
''
लतिका ? ''
''
हाँ वह भी आ रही है। अब तुम डिसाइड करो कि तुम आ रही हो या नहीं। ''
''
पार्थ मैं आ रही हूँ। ''
''
केतकी मुझे दुख हुआ कि तुम अब तक मुझे दोस्त नहीं मान सकी। ''
''
पार्थ मुझे गर्व होता तुम्हें दोस्त मान कर लेकिन डरती हूँ। ''
''
किससे ? ''
''
अपने आपसे पार्थ  खेर छोडो कल मैं आ रही हूँ लतिका के साथ। ''

वह पार्टी नहीं कुछ अच्छे सुलझे लोगों की महफिल थी, न कोई औपचारिकता, न कोई फालतू ताम-झाम न बैरों अर्दलियों की भीडसब लोग घेरा बनाए बैठे थे सामने ही बारबेक्यू स्नैक्स का इंतजाम थानवम्बर के मीठी गुलाबी ठण्ड के दिन थेपार्थ का ये लॉन उसकी सुरूचि का परिचय दे रहा था, सफेद, हल्के जामुनी, पीले, मरून क्रिसेन्थेमम जी खोल कर खिले थेबीचों-बीच अलाव का इंतजाम था।  वह भी लतिका के साथ उन लोगों में शामिल हो गईकुछ चेहरे जाने पहचाने थे कुछ अनजान, परिचय हुआ।  लेकिन बहुत आग्रह से आमंत्रित करने वाले मेजबान नदारद थेउसकी आँखों से लतिका ने वही प्रश्न उठा कर साथ बैठे लोगों से पूछ लिया।  

'' वेयर इज द होस्ट ? ''
''
कोई अर्जेन्ट सा केस आगया था। ''
''
आज सनडे को भी ? ''
''
अरे यार क्राइम क्या डेज और डेटस देखकर होंगे ? ''

बात फिर क्राइम से शुरू होकर राजनीति फिर फिल्मों से होती हुई संगीत पर आ टिकीइतने में पार्थ आ गए, उसे देख सीधे वहीं चले आएवर्दी और पीक कैप में पार्थ को पहली बार देख रही थीमन कुछ अजानी सी लय में धडक़ने लगा  

'' वॅलकम केतकी, बेहद अच्छा लगा तुम्हें यहाँ देखकर। ''  पार्थ जिस तरह एकदम पास खडे होकर कोमल स्वरों में बोल रहे थे तो उसकी चेतना कहीं मुंदती जा रही थी।  लतिका न बोल पडती तो वह यूं ही हतप्रभ खडी रहती।  

'' कहाँ थे महाशय ? हमें बुलाकर खुद गायब ! ''
''
सॉरी लतिका, अच्छा क्या लोगी ? ''
''
अभी सॉफ्ट ड्रिन्क लिया था। ''
''
वाइन लोगी ? केतकी तुम ? ''
''
नहीं पार्थ । मैं नहीं। ''
''
मैं लूंगी पार्थ, यू नो माय चॉइस । ''

कह कर लतिका गायब हो गई, वहाँ अलाव के पास संगीत की महफिल जुड ग़ई थी।  लतिका यहाँ शासकीय कन्या महाविद्यालय में फाइन आर्टस की हेड हैमस्त-बेलौस और किसी बंधन को न मानने वाली एकदम सनकी है इसीलिए कलाकार है और अविवाहित है।  

''हम भी वहीं चलें।  पार्थ ने कहा। ''

वहाँ सहगल दंपत्ति जगजीत-चित्रा की एक डुएट गज़ल गा रहे थे-

'' मंजिल न दे चराग न दे हौसला तो दे
तिनके का ही सही तू मगर आसरा तो दे ''

पार्थ ने मुस्कुरा कर उसे देखा, पार्थ की मुस्कान की प्रतिक्रिया को ताडने के लिए लतिका उसे ही देख रही थी, वह उपेक्षित कर गई पार्थ की मुस्कान।  

डिनर सर्व होते - होते ग्यारह बज गए, पार्थ कपडे बदल कर अर्दली को इन्सट्रक्शन्स दे रहे थे।  चूडीदार कुर्ते-पायजामे में एकदम बंगाल का प्रतिनिधित्व कर रहे थे।  बडी बडी सम्मोहक आँखे, चौडी पेशानी   

'' मैं कुछ मदद करूं? '' केतकी ने अन्दर आ कर पूछा ।
''
ओह केतकी! नहीं सब तैयार है।  सच कहूँ तो अब भी यकीन नहीं हो रहा कि तुम आई हो। ''
''
ऐसा भी क्या पार्थ । ''
''
जिस तरह से तुम मना कर रही थीं। ''
''
न आती तो बहुत कुछ मिस करती। ''
''
सच! आज तुम बच्ची सी लग रही हो इस लांग स्कर्ट में। ''
''
पार्थ ये बच्ची भी बडी अच्छी गज़लें गाती है। ''  लतिका ने फिर व्यवधान डाला।
''
सच! तो बस डिनर के बाद। ''

केतकी मना करती रही लेकिन सुस्वादु भोजन के बाद उसे गाना पडाउसने फरीदा खानम की सुप्रसिध्द गज़ल गाई-

''आज जाने की जिद ना करो
हाय मर जाएंगे हम तो लुट जाएंगे
ऐसी बातें किया न करो
.... ''

खूब दाद मिली केतकी कोबहुत दिनों बाद ये गज़ल गाई थीनिशीथ को पसंद थीमन भर आया केतकी का आज बात बात पर कमजोर क्यों हो रही है वह पार्थ ने मन का कोई टूटा तार छेड दिया है या ये पी एम एस का चक्कर हैबेहद स्ट्रांगली एफेक्ट करता है पूरे मासिक-चक्र के दौरान यह हारमोन्स का घटता बढता ग्राफ केतकी को।  

महफिल उठी पार्थ की गज़ल और आइसक्रीम के बाद  

'' रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
आ फिर से मुझे छोड क़े जाने के लिए आ
.... '' 

पार्थ खुद उसे छोडने आए अपनी फिएट में जो पहले तो स्टार्ट ही होने का नाम ले रही थी स्टार्ट हुई तो रास्ते भर रूकते चलते आईआज उसे अपने कोने वाले ब्लॉक में पटक दिये जाने पर जरा भी गुस्सा न आया।  पार्थ को उसने कॉफी पीने के लिये उपर बुला लिया। सीढियाँ चढते हुए पार्थ ने कहा-

'' आज तुम्हें अपने आप से डर नहीं लग रहा? ''
''
श्श्श्पार्थ  चुप। '' 

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