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एक नदी ठिठकी सी- 4

'' केतकी ! '' पार्थ  ने झिडक़ना चाहा पर शब्द लरज ग़ए।  

केतकी की तेज साँसे सन्नाटा भंग कर रही थीवह अब एक उफनती बरसाती नदी थी जिस पर बाँध नहीं बाँधा  जा सकता था, उसे तो बस बाँहों में लेकर ही पार उतरा जा सकता था।  

'' क्या ये गेस्ट हाउस ही शापित है? क्यों ले आया केतकी को यहाँ ? ''

यही तो दिन थे जब पिछली बार यहाँ आया था।  गहरी नींद के बीच एक खटखट हुई।  नींद से उलझ कर वह उठा था हार कर उसने दरवाजा खोला था।  बाहर एक संतरी खडा था उसके साथ एक आदिवासी, सुपुष्ट लडक़ी अन्दर चली आई।  

'' कौन है ये ? ''
''
सर, पता नहीं कहती है किसी ने यहाँ भेजा है। ''

लडक़ी स्वस्थ और चमकीली काली त्वचा वाली थी।  छोटे से लहंगे से झांकती लम्बी टाँगे, सुपर मॉडल सी सधी देह।  लेकिन पार्थ का गुस्से से बुरा हाल था वह निर्दोष संतरी पर ही बिगड ग़या।  

'' समझते क्या हैं ये लोग? ले जाओ इसे जहाँ से आई है।  क्या मुझसे पहले यही सब होता रहा है। ''
''
पता नहीं सर, मैं भी नया हूँ। ''

लौटते ही उसने संबधित सब इन्सपेक्टर को ससपेंड कर दिया और गाँव के सरपन्च को वार्निंग ही दिलवा सका राजनैतिक दबाब की वजह से पर अच्छा खासा हंगामा खडा होगया था।  

लेकिन न जाने क्यों वह आदिवासी निर्दोष काली आँखों वाली बाला अवचेतन से होकर उसके थके हुए सपनों में चली आती थी।  और आज ये केतकी।  क्या करूं इसका? पार्थ उठकर चप्पल पहनने लगा पर केतकी ने कुर्ते का छोर पकड लिया

'' छोडो केतकी। ''
'' मत जाओ ना! ''
''
क्यों परीक्षा ले रही हो मेरी ? ऐसे संबधों का क्या भविष्य तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं चाहता मैं।  नहीं चाहता कि जीवन के प्रति तुम्हारी आस्था को एक और धक्का पहूँचे।  छोडो केतकी। ''
''
आई नीड यू बेडली।  मुझे कुछ नहीं चाहिए न अफेयर न शादी बस इस पल के लिए एक घनेरा सम्पर्क। ''

एक पुरूष और कितना संयम बरतता? उसने स्निग्ध आलिंगन में उसे बाँध लिया।  मगर केतकी के नशीले कसाव उसे आहत कर रहे थे और वह केतकी के स्पष्ट आमंत्रण में बह गया।  

चिडियों के अनवरत कलरव से उसकी नींद टूटी।  पस ही गलबहियाँ डाले केतकी की अनावृत स्वर्ण काया उससे लिपटी थी।  चेहरे पर तुष्टि, सुघड नाक पर पसीने की बूँदे और गाल दहक रहे थे।  पार्थ ने उसकी पलकें चूम लीं।  खट से वह आँखे खोल कर बोल पडी।  

'' प्यार मत करने लगना पार्थ मुझे।  वरना मैं कमजोर हो जाउंगी।  बस हम दोस्त होकर जरूरतें बाँट रहे हैं। ''
''
प्यार करने से तो मैं खुद भी अपने आप को रोक नहीं पाउंगा।  हाँ तुमसे प्यार करने का आग्रह भी नहीं करूंगा। ''
''
ओह! पार्थ ! ''

चिडियों का कलरव उन्हें फिर बहा गया उद्वेगों में।  पार्थ के चुम्बनों में ऊष्मा इस बार अपने चरम पर थी।  अब लौटना भी तो था    

यायावर केतकी ने फिर लम्बे समय तक कोई सम्पर्क नहीं साधा।  वह जानता था वह ऐसी ही है।  वह यायावरी नदी सी एक दिन लौट भी आई और फोन किया।  

'' मैं पापा मम्मी को दमनदीव ले गई थी और भी बहुत सारी जगह हम घूमे पूरे महीने की एल टी सी पर थी मैं। ''
''
बिना इनफॉर्म किए सोचा भी नहीं कि मैं चिन्ता में होउंगा। ''
''
पार्थ  कहा था न मैंने जुडना मत।  तिकोना प्यार बहुत कष्टप्रद होता है। ''
''
तुम शादी कर लो फिर नहीं चिन्ता करूंगा। ''
''
तुम भी ना बस पार्थ....  ए इस वक्त क्या कर रहे हो? ''
''
टीवी देख रहा हूँ और क्या । ''
''
मैं आजाँऊ... ''
''
नहीं बहुत रात हो गई है।  ये कोई वक्त है? ''
''
यही तो वक्त है। ''
''
शटअप केतकी।  मेरे घर पर गेस्ट है। ''
''
कौन शाश्वती जी आई हुई हैं? ''
''
ना।  मेरा एक जूनियर। ''

केतकी ने फोन पटक दिया।  पागल है ये लडक़ी।  

अगले दिन लंच पर पार्थ ने उसे बुला लिया।  मॉर्निंग डयूटी खत्म कर वह सीधे ही पहुँच गई।  पार्थ पार्थ करती हुई स्टडी में घुसी और अचकचा कर लौट आई।  

'' कौन था वह? ''

'' सुनिये! ''
''
जी ! ''
''
किसे ढूंढ रही हैं। ''
''
पार्थ.. ''
''
आप केतकी हैं? ''
''
हाँ, मगर.. ''
''
मैं अनुराग हूँ , पार्थ का दोस्त समझें या छोटा भाई।  अभी वह लौटे नहीं हैं, फोन पर बताया था आप आ रही हैं।  बस वह भी आते होंगे।  बैठिये ना... ''
''
आप क्या करते हैं? '' एक लम्बी खामोशी को तोडते हुए केतकी अनचीन्हा सा सवाल कर बैठी।  
''
मैं यहीं पास के शहर भीलवाडा में डी एम हूँ। ''
''
हाँ? ''
''
लगता नहीं क्या? ''
''
बहुत कम उम्र लगते हैं। ''
''
पर हूँ नहीं। ''  अनुराग ने हँस कर सफाई दी।  और पार्थ आ गए थे।
''
अनुराग मिले इस जंगली बिल्ली से? ''
''
आप तो चुप ही रहें ।  इनवाइट करके गायब हो जाना आपकी पुरानी आदत है। ''

पार्थ, अनुराग और केतकी को साथ देख एक सुखद अनुभूति से भर गया।  पितृहीन अनुराग कहने को स्कूल से ही उसका जूनियर था मगर उसने हर तरह से बडे भाई का सा सम्मान दिया और बदले में पाया हर कदम पर मार्गदर्शन और दुलार।  और ये केतकी उसके न जाने किस जन्म की सखि।  उधर वो दोनों बातों में व्यस्त थे इधर एक सुन्दर कल्पना पार्थ के मन में आकार ले रही थी जिससे वे दोनों बेखबर से दुनिया-जहान के साहित्य की बातें कर रहे थे।  चलो एक रुचि तो मिलती है वैसे दोनों एकदम विपरीत हैं अनेक आयामों में, एक शान्त, सन्तुलित, व्यवहारिक, दूसरा असामाजिक, दु:साहसी, अव्यवहारिक और बातूनी।  एक बेहद शोख , खूबसूरत शख्सियत और दूजा साधारण कद काठी वाला सादा सा व्यक्ति।  कहीं सुना है यही विषमताएं शादी के बाद एक-दूसरे की पूरक बन जाती हैं।  शाम तक रोके रखा पार्थ ने केतकी को और अगले दिन अनुराग को शहर घुमाने की जिम्मेदारी भी उसे दे दी।  

दोनों अच्छे बच्चों की तरह शाम बीतते ही लौट आए, बुध्दू! शाम ही तो रूमानी होती है।  केतकी के जाने के बाद उसने अनुराग से कुरेद कर पूछा

'' कैसी है? ''
''
क्या झीलें? ''
''
  नहीं बे नदी वो पहाडी नदी नहीं समझा केतकी ! ''
''
अच्छी है, क्यों ? ''
''
बस्स! ''
''
हाँ।  तो और क्या। ''
''
तू नहीं सुधरेगा। ''
''
भाई, अच्छी है केतकी पर आप जिस सन्दर्भ में बात कर रहे हैं उसमें  क्या वो मुझे पसंद करेगी? ''
''
तू अपनी बात कर, तुझे पसंद है? ''
''
उसे कौन नहीं पसंद करेगा ? ''
''
तो तुझमें क्या कमी है जहाँ तक केतकी की पसंद की बात है, उसे पुरूष में बुध्दिजीविता और कलाप्रियता आकर्षित करती है।  आंटी कह रही थी तेरे लिये रिश्तों का ढेर लगा है, तुझे कोई पसंद ही नहीं... ''
''
हाँ।  खरीदारों की लाईन लगी है, ऊँची बोलियों वाले एक से बढ क़र एक मुझे पत्नि चाहिये, सही मायनों में जीवनसंगिनी। ''
''
केतकी से तुझे मिलवाने का खयाल मुझे इसीलिये आया था। ''
''
तो आप ठीक समझते हैं तो बात करके देखिये। ''
''
नहीं अनुराग , तू ही प्रपोज क़र।  मुझे अलग रख कर अन्यथा वह बुरा मानेगी।  शादी के बारे में अभी वह असमंजस में है।  तू उसे कनविन्स कर। ''
''
उसने मना कर दिया तो। ''
''
नहीं वह ऐसा नहीं करेगी ।  हाँ सोचुँगी कह कर टाल देगी और मुझसे आकर बात करेगी तब मैं उसे कनविन्स करूंगा। ''
''
आप तो जानते हैं भाई मैं ऐसी बातों में साहस नहीं जुटा पाता। ''
''
हाँ जानता हूँ , अब नीरजा की तरह इसे नहीं खोना चाहता है तो बिना वक्त गँवाए प्रपोज क़र दे। ''

पार्थ की आशंका सही थी।  उस रात केतकी के घर डिनर पर बहाना बना कर वह चला गया था।  अनुराग ने सहजता से अपने विचार केतकी के आगे रख दिये और केतकी ने सौम्यता से उत्तर दिया -

'' शादी के बारे में अभी मैं ठीक से सोच नहीं पा रही अनुराग ।  फिर भी मैं आपके प्रस्ताव पर गौर करूँगी। ''

अगले दिन अनुराग लौट गया।  अगले सप्ताहान्त पर उन दोनों को अपने जिले भीलवाडा आने का आमंत्रण देकर।  केतकी से रहा नहीं गया उसके जाते ही वह पार्थसे मिली।  

'' पार्थ  वो अनुराग.. ''
''
सुबह चला गया। '' नाक पर चश्मा टिकाए वह जानबूझ कर अखबार में डूबा रहा।
''
वह प्रपोज क़र रहा था। ''
''
क्या? '' उसी ओढी हुई उदासीनता के साथ वह बोला।
''
शादी के लिये... ''
'' तो तुमने क्या कहा? ''
''
कुछ खास नहीं यही कि अभी इरादा नहीं। ''
''
क्यों अच्छा लडक़ा नहीं वह? तुम्हारे लायक नहीं।  टॉल, डार्क, हेन्डसम नहीं? '' अब अखबार पटक कर गंभीर हो गया था पार्थ।
''
नहीं पार्थ ऐसी बात नहीं।  अनुराग जैसा लडक़ा पहले मिला होता तो। ''
''
अब क्या हो गया ? ''
''
आप... ''
''
मुझे तो तुम हिदायत दे चुकी हो कि मैं तुमसे ना जुडूँ।  न कोई मोह पालूं। ''
पर , अतीत! अनुराग  बेहद निश्छल है।
''
तुम भी उतनी ही निष्पाप हो।  और अतीत बीत जाने के लिये होता है, साथ लेकर चलने या प्रचार करने के लिये नहीं होता।  एक्सेप्ट कर लो उसका प्रपोजल। यह वक्त लौटेगा नहीं। ''
''
डरती हूँ पार्थ क्या उसे अपना सम्पूर्ण दे पाऊंगी? ''
''
अगर वह तुम्हें अपना सम्पूर्ण देगा तब भी? तुम दाम्पत्य को बाहर से नहीं समझ सकतीं।  दाम्पत्य सम्पूर्ण देने और लेने की कभी न रुकने वाली प्रतिक्रिया है। ''
''
पार्थ.. ''
''
सारे असमंजस छोड, अतीत भूल कर अनुराग  को अपना आप सौंप दो।  मुझे बेहद खुशी होगी अगर ऐसा संभव हो सका तो। ''
''
पार्थ... ''
''
अब मत ठिठको केतकी।  अपने प्रवाह को राह दो।  ठहर कर नदी, नदी नहीं रहती उदास झील हो जाती है।  तुम्हें तो बहना है केतकी।  नदी को बाँधने वाले मूर्ख हैं, नदी को तो बाँहों में बाँध साथ बहा जाता है। ''

- मनीषा कुलश्रेष्ठ
December 14, 2000

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