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पीढियों का अन्तराल ''मम्मी
आप तो एक ऑर्थोडॉक्स हाउजवाईफ रही हो जिन्दगी भर,
हाउ कैन यू अण्डरस्टेण्ड अस?
यू नो इट इज बेसिकली जेनरेशन
गॅप! '' मेरी बडी बेटी मानसी अपने पापा की बेटी रही है हमेशा से। उन्होंने उसे गढा और उसे आई ए एस बनने के लिये न केवल प्रेरित किया वरन उसे बना कर ही माने। रूपसी मेरे निकट रही, अपने पिता जैसे गढन के बावजूद उसके अन्दर सारी असामानताएं मेरी हैं। गज़ब की तो जिद्दी है। विद्रोहिणी, तेज-तर्रार, डिबेट्स में हमेशा पहला ही स्थान पाती रही है। और मैं मैंने तो बच्चों के बडे होने के साथ-साथ अपनी सारी सतहें साध ली थीं और एक माँ पत्नि होकर रह गई थी, यही थी कीमत बहुत जिद्दी होने की। मानसी सैटल्ड है, आई ए एस है और अपने ही एक बैचमेट शाश्वत के साथ उसने जीवन बिताने का निर्णय ले लिया है। शाश्वत और उसके माता-पिता से मिलकर किसी को भी मानसी के इस निर्णय पर किसी को आपत्ति न थी बल्कि मैं तो निश्चिंत थी। चिराग लेकर ढूंढती तो भी कहाँ पाती अपनी मानसी के लिये इतना समझदार दूल्हा? मानसी में सदैव से ठहराव था, सही गलत चुनने की क्षमता थी। आजकल आई हुई है छुट्टियाँ लेकर दरअसल घबरा कर मैंने ही बुलाया था उसे। रूपसी की वजह से। उसके निर्णय हमेशा मुझे ठीक नहीं लगते। एक तो मेरे और अनिरूध्द की इच्छा के विपरीत दिल्ली में एक मल्टीनेशनल में काम कर रही है और अकेले एक फ्लैट लेकर रहती है। अब एक प्रोजेक्ट पर चार साल के लिये यू एस ए जाने की जिद। कहती र्है - ''
लडक़ा होता तो खुशी से भेज देती ना?
जब पाला है सारे भेद भाव
भुला कर तो अब क्यों डरती हो? '' अनिकेत और मुझे कभी बडे शहर तक तो रास नहीं आए, हमारी नब्ज तो छोटे आरामदेह शहरों के साथ ही धडक़ती रही है। छोटे शहरों के बडे ख़ुले अहातों वाले सरकारी घर, फुलवारियाँ, साथ बिताने को पर्याप्त खाली समय, परिवार में होने का आनंद, यही तो हमारी प्राथमिकताएं थीं। अपना घर भी हमने एक मध्यम श्रेणी के शहर में, खुले से अहाते वाला बनवाया है। बस अब दो साल बाद अनिकेत रिटायर होने वाले हैं। अब फुरसतों के दिन आए हैं तो कैसे अजनबी देश जा बसें? मानसी व्यस्त तो है, पर उसमें हमारे जीवन मूल्य धडक़ते हैं। रूपसी वक्त की रफ्तार को भी पीछे छोड देना चाहती है। अनिकेत चाह कर भी अपनी अनिच्छा रूपसी पर थोपना नहीं चाहते, यही बात मुझे अखर रही है, उनकी बात टालने का साहस दोनों में से किसी को नहीं है। पर वो कभी भी ऐसा करते ही नहीं। मानसी का कहना है, ''मम्मी पापा अपनी जगह ठीक ही हैं। अब वो बच्ची तो नहीं। चौबीस साल की लडक़ी है। '' ये भी किचन में मेरे और मानसी के पास आ खडे हुए। ''
निम्मी,
तुम्हें क्या हो गया है?
रूपसी ठीक कहती है
ऑर्थोडॉक्स हो गई हो। कभी तुम भी तो वुमन लिब की,
आत्मनिर्णय,
स्वतन्त्रता की बातें करती
थीं। मुझसे भी बहस करती थीं। मंगलवार की पूजा के वक्त सुन्दर काण्ड का वह दोहा
भी मेरे मुँह से सुनने पर आपत्ति करती थीं।
'' रात रूपसी और मानसी के कमरे में ही सोई मैं। ''
हाय मम्मा,
आपने हमारा कमरा जरा भी नहीं
बदला? ''
मानसी चहकी। रूपसी मुस्कुरा दी।
मानसी मेरे सिरहाने बैठी थी, रूपसी पेट के बल थोडा सा नाराज हो एक मैगजीन पलट रही थी। अरसे बाद हम तीनों यूँ साथ थे। अनिकेत जानबूझ कर हमारे बीच नहीं आए। वो जानते थे मैं रूप से बात करना चाहती हूँ। और मैं मानसी के बहाने भी अभी तक इस लडक़ी से बात करने की हिम्मत नहीं कर पा रही जानती हूँ बिफर जाऐगी। कैसे भेज दूँ, अनजान देश में, चार साल के लिये। शादी की उमर है, शादी करो फिर कहीं भी जाओ। मैं भी अपनी एक पीढी पुरानी माँ की तरह कबसे सोचने लगी? ''
रूपमनु कभी मेरे बारे में जानना
चाहोगे?
मैं कैसी थी,
मेरा केशौर्य,
मेरी युवावस्था और
महत्वाकांक्षाएं?
'' '' ट्वैल्थ के बाद से ही हॉस्टल में रही, हम तीनों भाई बहन अपने-अपने आत्म निर्णयों के साथ, अपनी पूरी आत्मचेतनता के साथ बाहर पढते थे। छुट्टियों में साथ रहते। मैं पढने में ठीक ही थी लेकिन पढाई के साथ-साथ सारी गतिविधियाँ, अच्छा साहित्य पढना, स्वयं लिखना, शास्त्रीय नृत्य सीखना साथ साथ चलता था। पर मम्मी ने एक दिन कह दिया कि इन सबसे कैरियर नहीं बनता, सो दीदी के पदचिन्हों पर चलकर साईन्स ली, बी एस सी किया, पी एम टी भी दिया। सलेक्शन नहीं हुआ। फिर शुरू हुई विद्रोह की कहानी, एम एस सी की जगह मैंने हिन्दी साहित्य में एम ए में एडमिशन लिया, जर्नलिज्म के साथ। तब मीडीया सबसे आकर्षक कैरियर लगता था। रेडियो, दूरदर्शन, साहित्य जगत बहुत कम उम्र में अपनी एक पहचान बना ली थी मैं ने। तब जीन्स पहनना छोटे शहरों में टेबू था, मैं पहनती और अकेले यात्राएं करती थी। '' ''
झूठ! मैं नहीं मानती
,
नानी के यहाँ तक तो पापा छोडते या
मामा लेने आते थे,
हमारे बडे होने के बाद तक।
'' रूप अब तकिया छोड सीधी बैठ गई आलथी-पालथी मार कर, उसके चेहरे पर उत्सुकता का वही बचपन वाला पारदर्शी भाव था, मैं आज नदी के सहज प्रवाह सी बही जा रही थी, अपनी तमाम पारदर्शिता के साथ ताकि मेरी बच्चियाँ अपने प्रतिबिम्ब उसमें ढूंढ सकें और अपने जीवन प्रवाह सही दिशा में मोड सकें। ''
फिर मम्मी दोनों साथ बोल पडे।
'' एक बार हमारे रेडियो के ही म्यूजिक़ विभाग के प्रोडयुसर आकर बोले - '' तुम्हारी आवाज में बडी क़शिश है, गाती हो? अरे सीखो भई। मैं ने कुछ गजलें कम्पोज की हैं, तुम्हें सिखा कर एक प्रोग्राम रेकॉर्ड करते हैं। मैंने भी रुचि लेकर हाँमी भर दी। तो वो बोला, आ जाओ कल से घर पर। मैंने पता-वता ले लिया। और अगले दिन खुशी-खुशी अपने कलीग्स को बताया कि मैं गज़ल सीखने जा रही हूँ, पुरी सर से। '' उस दिन अच्छा खासा बारिश का दिन था। चाय का दौर चल रहा था, वहीं हमसे थोडे सीनियर एक प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव राजेश बैठे थे। उन्होंने चौंक कर मुझे देखा, बाकि लोग मुस्कुराने लगे। मैं कुछ समझी ही नहीं। राजेश उठ कर अपने ऑफिस में चले गए। मैं स्क्रिप्ट चैक करने लगी। इतने में इन्टरकॉम बजा मेरे लिये था। राजेश ने बुलाया था। मैं गई तो वे तमतमाए बैठे थे। ''
हाँ ! अब बताओ क्या कह रही थीं?
'' गुस्सा बहुत आ रहा था राजेश पर कि किसने इसे अधिकार दिया डाँटने का। पर भले के लिये ही तो डाँट रहा था सो चुपचाप खा ली। ''
उठाओ फोन मना करो अभी...
'' और रूप-मनु वो बदमाश सच में आ गया। वार्डन से बात भी कर ली, तब मैंने वार्डन को अलग ले जाकर असलियत बताई तो उन्होंने उसे चलता किया। '' मम्मी और वो राजेश.... '' ये रूप ही हो सकती थी। '' मेरा दिल काँप गया, यह बचपन से मेरे हर उतरते-चढते भाव को भाँप लेती थी। '' ''
आप तो उनकी शुक्रगुजार हो गई होंगी।
बहुत खयाल रखते थे आपका?
आप उन्हें मानने लगी होंगी। रूप
पीछे ही पड ग़ई,
मानसी भी मंद मुस्कान से मुझे देख
रही थी उत्सुक होकर। '' बस फिर क्या
था हमारा कमरा टीन एज गर्ल्स की सी चीखों से
गूँज
गया।
'' पहले दिन ही उनका फ्रस्ट्रेशन झलक आया। '' '' देखो निमिषा, मुझे लगा मुझे तुम्हारी हेल्प करनी चाहिये इसलिये तुम्हें ऑफर किया, मुझे कोई किराया नहीं बस प्राईवेसी चाहिये। मुझे किसी की दखलंदाजी नहीं पसंद। मैं बाहर ही खाती हूँ, तुम अफोर्ड नहीं कर सकोगी सो यू यूज क़िचन। अपने बेडरूम से किचन बस मेरे हिस्से में मेरे बुलाने पर ही आना। कोई जरूरत हो तो सुबह ब्रेकफास्ट के वक्त बात करेंगे। '' '' वो देर रात तक ड्रिंक करती...गज़लें सुनती....सिगरेट पीतीं। मुझे घुटन होती। पता चला किसी विवाहित पुरूष के साथ उनका भावनात्मक जुडाव है। मैं सोचती जब आखिरकार पुरूष से ही जुडना हुआ, उसके हाथों मजबूर होना हुआ तो उसके अस्तित्व को नकारने से क्या मिला? '' '' एक दिन मैंने अपने हाथों से खाना बना कर उन्हें बाहर जाने और ड्रिंक करने से रोक लिया। बस उस दिन की अंतरंगता में उन्होंने अपने बारे में बताया कि कैसे उनके सभी भाई बहन अपने में मस्त हैं और वो कैरियर की महत्वाकांक्षा में यहाँ तक आ गईं और अचानक लगा कि वो अकेली हैं। ऐसे में जो भी मिला पुरूष या महिला मित्र सबके अपने परिवार और उससे जुडी व्यस्तताएं थीं।'' '' निमिषा वक्त रहते शादी कर लेना। कैरियर के पीछे भागने से आजादी तो मिलती है, पैसा भी कि इन दोनों की अधिकता से आप चिढने लगते हो क्योंकि इसे भोगने के लिये आपके साथ कोई नहीं होता। शादी के साथ संभव हो तो कैरियर की सोचो। '' '' और जब मैं छुट्टी लेकर घर आई तो पहली बात मम्मी से यही कही कि मेरी शादी कर दो। और पहला रिश्ता तुम्हारे पापा का ही था, उन्हें मैं पहली नजर में पसंद आ गई। '' ''
आती ही,
मेरी मम्मी जो इतनी खूबसूरत
हैं।''
मानसी ने लाड से कहा। मेरा घर ईश्वर की बरसती अनुकम्पाओं से छलक रहा था। -
मनीषा कुलश्रेष्ठ |
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