समुद्र थे तुम
मैं एक झरना छोटा - सा, बरसात से उपजा
तुम्हारी प्रकृति में थीं लहरें अनगिन एक था तट नाम में थी गहराई
मेरी नियति में था ऊंचाई से गिरना तुम्हारी लहरों में एक लहर बन तुम्हारे नाम में डूब घुल मिल जाना
तुम वहीं हो, मेरे अथाह देखो, मैं कहीं नहीं हूँ इन सूखे मौसमों में
मनीषा कुलश्रेष्ठ जुलाई 1 , 2006
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