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फागुन की रितु रंगीली

ये फागुन की रितु बडी रंगीली
रंग - रस से धरा हो गई गीली

खेतों ने ओढी चुनर पीली - पीली
हवा भी है जरा सीली - सीली 

अजब रंगों की है फुहार हरी - नीली
इनमें बसी है केसरिया महक अलबेली 

जाग उठी हैं तेरी आंखें सपनीली
कौन था सपने में बता री सहेली

हो गई है गुलाबी राधा शर्मीली
बजी है कहीं श्याम की बांसुरी सुरीली

 

मनीषा कुलश्रेष्ठ
मार्च 1, 2007 

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