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   सम्प्रेषण

''हाय कविता''
''
हलो उत्कर्ष''
''
वान्ट टू चैट?''
''
यस। बट डीसेन्ट चैट।''
''
ऑफ कोर्स।''
''
कविता आर यू इन्डियन?''
''
यस। इण्डियन। टिपीकल इण्डियन।''
''
इन्टरैस्टिंग।''
''
एण्ड यू ?''
''
मी? एन आर आईनॉन रिलायबल इण्डियन। आई एम वर्किंग इन बोस्टन एज सॉफ्टवेयर एन्जीनियर। टेल समथिंग एबाउट यू। वाट आर योर इन्टरैस्ट्स?''
''
एज ईन्टरैस्टिंग एज माय नेम म्यूजिक, लिटरेचर।''
''
ओह कवितागुड।''

बस यहीं से हुई थी शुरुआत एक सम्प्रेषण कीतब चाहे इन्टरनेट पर हमने अपने सही नाम छुपा लिये हों...पर जब ये सिलसिला रोज पर आया तो हमने अच्छे मित्रों की तरह अपने जीवन खोल कर रख दिये वह विवाहिता थी, एक नर्सरी में पढते नन्हे बच्चे कौस्तुभ की मम्मी और एक व्यस्त और सफल डॉक्टर की गर्विता पत्नीमैं ने भी उसे जल्दी ही बता दिया था कि मैं एक विधुर हूँ और दो टीन एजर बच्चों का पिता हूँ। हम कई-कई विषयों पर बात करते संगीत, कला, साहित्य, आध्यात्म, राजनीति, प्रेम, दाम्पत्य..अपराध, बच्चों का पालन-पोषण और अपनी जिन्दगी के सुखों, दुखों हार और जीत परहम मुकम्मिल समय पर इन्टरनेट पर मिलते और दो घण्टे जरूर चैट करतेदिल्ली और बोस्टन की घडियों का अन्तर भी हमें रोक न पातीमैं यहाँ बोस्टन में बैठा ऑफिस से लौटकर उसके जागने का बेसब्री से इंतजार करता वह जागती, पति और कौस्तुभ का नाश्ता बनाती उन्हें स्कूल, नर्सिंगहोम रवाना करती और तब इन्टरनेट पर आ पाती, तब हम चैट करते जब मैं बेसुध लॉग की तरह पडा सो रहा होता तब वईमेल करती और जब सुबह मैं उठता, उसे पाकर मैं इन्टरनेट पर आ जाता, तब वहाँ वह खाली बैठी होती थी, मुझे अपने बच्चों को उठाना होता और स्वयं ऑफिस जाने के लिये तैयार होना होता थाहम बस ऐसे ही वक्त को वक्त से चुराते रहतेहम खूब फालतू बातें करते -

''मुझे बारिश पसंद है।''
''
मुझे भी तो हम कितने एक से हैं।''
''
मुझे गर्मिया नहीं भातीं।''
''
मुझे भाती हैं। अरे वही तो आम का मौसम जो होता है। वहाँ मिलते हैं आम?''
''
यहाँ सब कुछ मिलता है।''
''
भुट्टा भी?''
''
हाँ।''
''
गन्ना भी?''
''
वो पता नहीं।''

कुछेक चीजों को छोड क़र हम बहुत कुछ मिलते-जुलते से थेदोनों ही दिल, जिन्दगी को दिल से ज्यादा तोलते, दिमाग से कमकला के प्रति दोनों का रुझानमैं वायलिन बजाता हूँ फुरसत में, उसने शास्त्रीय संगीत सीखा हैदोनों ही को अवसर नहीं मिल सके कला में प्रतिष्ठित होने केदोनों के पास अच्छे मित्र की कमी थीदोनों ही बहुत अर्न्तमुखी से थे लोगों के बीच और अकेले में अपने आपसे बहुत मुखरदिवास्वप्न देखना दोनों की आदत में शुमार था

''इस इन्टरनेट ने हमें एक बहुत कीमती, अनाम रिश्ता दिया है।''
''
इसे खोने मत देना कविता, इसी सम्प्रेषण के जरिये हम एकदूसरे में खुद को खोजते रहते हैं।''

कभी कभी बहस करते और नाराज हो जाते, फिर मनातेबहुत मिन्नतों के बाद उसने एक फोटोग्रार्फ ईमेल करके भेजा, अपनी भारतीयता की रची-बसी छबि में, हल्दी के रंग की लाल बॉर्डर वाली साडी में, लम्बी चोटी आगे किये हुए केन के झूले में बैठे हुए

तब पहली बार मैंने उसे कहा था -

''कवि तुम बहुत जवान और आकर्षक हो। मैं तो पैंतालीस साला एक प्रौढ हूँ ।''
''
उत्कर्ष, दोस्ती में उम्र के क्या मायने? किसी भी चीज क़े क्या मायने? दोस्ती दोस्ती है।''

तब मैं ने खिडक़ी से भारी पर्दा हटा बाहर झाँका थाबसन्त के की प्रतीक्षा में पेड नये लाल लाल पत्तों से भर गए थेसुबह के पाँच बजे थेसुबह की इस लालिमा में मुझे कविता की परछांई दिखाई दी और अचानक मैं टाईप कर गया -

''और दोस्ती आगे निकल आकर्षण या ऐसा ही कुछ अलग रिश्ता बन जाए तो!''
''
उत्कर्ष!''
''
कवि''

वह दो दिन लगातार इन्टरनेट पर नहीं आई मैं परेशान कि मैं ने उसकी भावनाओं से खिलवाड क़िया है, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिये थाउसने विश्वास कर मुझसे मित्रता की थी, साफ सुथरी सीतीसरे दिन वह वहां थी

''कवि''
''
कुछ लिखो।''
''
उत्कर्ष''
''
मैं बहुत परेशान रहा।''
''
मैं भी।''
''
तुम क्यों''
''
आपसे चैट के बाद एक वायरस आ गया था।''
''
तुम्हारे कम्प्यूटर में?''
''
उं..नहींमन में।''
''
मतलब?''
''
तुम्हारी आकर्षण वाली बात बहुत कन्टीजियस थी।''
''
मतलब? ''
''
मतलब वह रोग मुझे भी लग गया।''

और इन्टरनेट पर ही प्रेम ने भक से आग पकड लीकविता के पति के किसी मेडिकल सेमिनार में जापान चले जाने पर कुछ दिन ये आग धधक कर जलीतन-मन के विकार जल गए, शुध्द प्रेम सामने आयावह कैसे यह मैं ही जानता हूँ। तब हम प्रेम के ज्वार में लगातार बहते- उबरते

''कवि तुम्हारे सादगी भरे सौन्दर्य ने पागल कर दिया है।''
''
उत्कर्ष, प्रेम में इतनी दीवानगी मैं ने पहले कभी महसूस नहीं की। वह भी अनदेखे-अनजाने शख्स के साथ प्रेम।''
''
कवि, यह जो तुम्हारे गाल पर तिल है क्या उसे कभी छू सकूंगा?''
''
वह आर्टीफिशीयल है।''
''
कवि तुम्हारे लम्बे बालोंकी महक''
''
उत्कर्ष अब वे लम्बे नहीं रहे।''
''
कवि मेरे आधे बाल सफेद हैं।''
''
तो क्या''
''
मुझे अपने इस प्रेम से डर लगता है कवि।''
''
मुझे तो यह भी नहीं पता कि ये प्रेम है या कुछ और। उत्कर्ष मैं ने कभी प्रेम नहीं किया, शादी ही की बस।''
''
तुम अराध्य की तरह मन में बस गई हो... ''
''
मुझे आप सुलझे हुए इन्सान और अच्छे कलाप्रिय व्यक्ति लगते हैं।''
''
तुम्हारे आने ही से तो मेरे जीवन में कलाओं ने फिर से सांस ली है।''
''
कभी हम मिलेंगे?''
''
पता नहीं।''
''
आप भारत नहीं आते।''
''
तीन साल में एक बार, बच्चों को उनकी नानी से मिलवाने।''
''
और आपका परिवार?''
''
मेरा वहाँ अब कोई नहीं रहा कविता, एक भाई है वह यहीं है अमेरिका में, न्यूजर्सी में।''
''
मैं हूँ ना!''
''
तुम तो अब बहुत कुछ हो। कल ऑफिस में भी तुम्हारे बारे में सोचता रहा और अकेला मुस्कुराता रहा।''
''
उत्कर्ष, मैं भी बहुत खुश रहने लगी हूँ आजकल।''
''
पतिदेव जापान गए हुए हैं इसलिये?''
''
नहीं, उनसे बहुत प्यार है। बडे अच्छे इन्सान हैं वे, हमेशा मुझे खुश देखना चाहते हैं। बस समय की ही कमी है उनके पास।''
''
कवि एक बारबस एक बार तुम्हें देखना, मिलना और छूना चाहता हूँ।''
''
देखना, मिलना तो ठीक है, पर छूना वह कठिन है।''
''
कठिन ही ना असंभव तो नहीं। एक बार एक पल के लिये एक आलिंगन ही सही।''
''
उत्कर्ष''
''
कवि एक कसा हुआ आलिंगन।''
''
हाथ बढाओ और ले लो न मुझे अपने इस कसते आलिंगन में।''
 ''चूम भी लूं। तुम्हारे लरजते होंठ? ''
 ''पलकें शर्म से भारी हैं उत्कर्ष।''
 ''याने इजाजत है?''

अकसर ये होता कि मुझे ऑफिस जाना होता और वह लिखती -

''बाहर चाँदनी रात में चमेली महक रही है, वही गंध मेरी देह में बस गई है। तुम यहाँ होते तो हम लॉन में संगमरमर की बैंच पर बैठ बतियाते। तुम्हारी बाँहें मुझे घेरे होतीं। मैं बहक रही हूँ उत्कर्ष!''
''
कवि, यहाँ दिन की धूप पसरी है ऑफिस जाने दो अब।''
''
अच्छा जाओपर अब जब लौटोगे तब सुबह जल्दी मैं नहीं जगने वाली, ऑन लाईन नहीं मिलूंगी।''

पर वह मिलतीऔर जब वह सुबह छ: बजे कौस्तुभ को स्कूल भेजने के चक्कर में ऑफलाईन जाने को कहती तो मैं रोकता

''रुक जाओ नदेखो दिल कितना शोर मचाता हुआ धडक़ रहा है।''
''
अपने दिल को मनाईए आज आप कौस्तुभ की स्कूल बस मिस करवाएंगे। रोहन और निकिता के एक्जाम्स कैसे हुए?''

हमें एकदूसरे के बच्चों के नाम, स्कूल, क्लास सब याद हो गए थेमेरे बच्चे बदलाव महसूस कर रहे थेपन्द्रह साल की निकिता कह ही बैठी -

''डैड, वाय डोन्ट यू रीमैरी!''

और अकस्मात मेरे आगे भीगे बालों की लम्बी चोटी गूथती, पीले रंग की साडी पहने कविता का चित्र सजीव हो गयाजब मन में प्रेम आकार लेने लगा तो भारत जाने के संयोग भी बैठ गएजब मैंने बच्चों को बताया तो वे बहुत खुश हुए थे

अब तो मैं रात भर उसे बाँहों में पाताउसकी बातें मुझे बेचैन करतीं मैं करवटें बदलता, कल्पनाओं में उसे अपना पातान जाने क्यों दिल हकीकत की ओर देखना ही नहीं चाहताइस ढलती उमर और मेरा यह बदलाव खुद मुझे हैरान करतामन मानता ही नहीं कि वह विवाहिता कैसे मुझे अपना सकती है? उससे अकेले मिलना संभव होगा? मन कहता प्रेम है तो वह आउट ऑफ द वे जाकर मुझसे मिलेगीमैं ने उसे फोन किया और उसने मेरे प्रस्ताव को स्वीकार भी किया कि वह मुझसे मिलेगी, एक बार तो मिलेगी हीउसने मेरी मित्रता के बारे में डॉक्टर साहब को भी बताया है, और उन्होंने इस मित्रता को उदारता से स्वीकार किया हैमन विपरीत भावों से भरा था बहुत सा असमंजस उस पर मिलने की उत्सुकता! कभी लगता कि मैं विधुर हूँ इसीलिये युवा स्त्री के शरीर की कामना में मरा जा रहा हूँ, दूसरे पल लगता, नहीं यह विशुध्द प्रेम हैउसकी चन्दन से बदन की कल्पना में मन धडक़ते-धडक़ते धक्क! से रह जाता

वह दिन भी आगयाहम सभी ने अपने बैग्स बडे उत्साह से जमाएबच्चों ने अपने कजिन्स के लिये ढेरों उपहार खरीदेमैं ने भी चुपचाप से प्लैटीनम में जडा नन्हे नन्हे हीरों और रूबी का एक तितली के आकार का नन्हा सा पैण्डेन्ट मखमली डिबिया में रख छुपा लियाप्लेन में भी बच्चे उत्साह में बातें करते, किताबें पढते रहे, मैं अपनी चंचला प्रेमिका की कल्पनाओं में खोया रहा, कैसी होगी वास्तव में वह, कैसी होगी उसकी प्रतिक्रिया! कैसा होगा पहला स्पर्श? जब वक्त न बीतता प्रतीत होकर भी न जाने कब बीत गयाबच्चों को मुम्बई उनके ननिहाल छोड, अगले दिन सुबह की ही फ्लाइट से मैं दिल्ली पहुँचा।

जब मैं ने उसे पहली बार उसके घर के ड्रॉईंग रूम में उसे देखा तो, मेरी कल्पना की वह मूर्ति वैसी ही थी जैसा उसे होना था, वही दमकता रंग, आकर्षक रूपपर इस मासूम आकृति में मेरी चंचला, बाँहें फैलाए आमन्त्रित करती प्रेयसी कहाँ थी? कौस्तुभ उसका दुपट्टा पकडे ख़डा था, वह एक ममतामयी माँ थीडॉक्टर साहब बडी विनम्रता से मिले, उनके पास बैठी वह एक सौम्य पत्नी थी

''अनुपमा के मित्र मेरे ही मेरे मित्र होते हैं नरेश जी, मुझे तो मित्र बनाने का समय ही नहीं मिलता। सारे सोशल ऑब्लीगेशन्स यही निभातीं हैं।''

जिस्म का ताप सामान्य हो चला था मैं सहज होकर उनसे मिला, अपने आत्मीयों की तरहएक अच्छे मेजबान की तरह उन्होंने मेरे लिये आरामदेह आतिथ्य का शिष्ट इन्तजाम किया था

अगली सुबह मैं जब उठा तो वह लॉन में पानी दे रही थीदूधिया कुर्ते-चूडीदार और दुपट्टे में उसका पवित्र रूप मुझमें शीतलता भर गयामुझे देख वह पाईप छोड क़र करीब आ गई

'' गुडमॉर्निंग।'' उसकी आखों में एक संकोच झलका।
''
गुडमॉर्निंग।''
''
सुबह-सुबह तैयार हो गई।''
''
हाँ, आज कौस्तुभ की बस छूट गई थी सो खुद छोडक़र आना पडा।''

क्यारियों में ढेरों गुलाब खिले थे वही संगमरमर की बैन्च! हमने साथ बैठ कर चाय पीआश्चर्यजनक रूप से मेंरा हृदय सात समुन्दर पार जिसके सान्निध्यमात्र की कल्पना से धडक़ जाता था, वही यहाँ एकदम उसके सामने, इसी संगमरमरी बैन्च पर बैठ कर भी शान्त थासहज और प्राकृतिक संकोच से उसकी पलकें भारी थींकोई बनावट नहींहम बहुत औपचारिक बातें करते रहे

'' दिल्ली का प्रदूषण तो जानलेवा है।''
''
जी। बोस्टन कैसा है।''
''
व्यस्त शहर है, पॉल्यूशन इतना नहीं।''
''
आप क्या करती रहती हैं जब डॉक्टर साहब नहीं होते।''
''
बसघर और कुछ शौक पाल रखे हैं, ''
''
जैसे इन्टरनेट चैटिंग? ''

हम साथ खुलकर हंसेमैं ने वह मखमली डिबिया उसे देना चाही तो अगले ही पल उसने पंख समेटती हंसिनी की तरह अपनी हंसी समेट ली

'' बस एक प्रेममय दोस्ती का उपहार है बस, स्वीकार कर लोगी तो अच्छा लगेगा।
कह कर मैं ने वहीं ग्रेनाईट की टेबल पर रख दी।''

शेष सब कुछ बहुत सुखद थापर वह आग ठण्डी हो चली थी वो बाँहें उठी ही नहीं जिन्होने उसकी कल्पना में कई बार तकिये को भींचा थाधूप निकल आई थी हम अन्दर आ गएवही गजलें चल रही थीं, जिनके शेर हम एक-दूसरे को लिखते थे

अब वह एकदम पास थी समर्पिता सी, होंठ भी लरज रहे थे, दुपट्टा भी सरक आया था, नन्हा धडक़ता हृदय वक्षों में कम्पन भर रहा थापलकें भी उठ-उठ कर गिर रही थींउसकी भीगी सी देह में से फूटती गंध भी ताज़ा खिली चमेली सी मधुर थीपर आज मेरे लिये यह गंध अंदर कहीं पूजा घर में से आती धूप बत्ती की पावन गंध में घुल पवित्र हो गई थीवह स्वयं एक जलती देवज्योति सी मेरे सामने थी कैसे हाथ बढा कर उसे अपवित्र कर देता? मैंने उसे हृदय से लगाया जरूर पर वैसे जैसे आरती के दिये से आरती लेते हैं ठीक वैसे ही भाव से, उसके मस्तक पर चूम कर, उसका खिसक आया दुपट्टा उसके थरथराते वक्ष पर डाल दियाउसे हतप्रभ छोड क़र कहा -

'' अनुपमा, ब्रेकफास्ट नहीं कराओगी? छोले-भटूरों की खुश्बू आ रही थी रसोई से ।''

वह सम्मोहन से जागी हो मानो -

'' ओह सॉरी! अभी मंगवाती हूँ।''

दोपहर डॉक्टर साहब याने अनुराग के आने पर हमने और भी अच्छे पल बिताएवे बेहद जिन्दादिल व्यक्ति लगे
अगली सुबह वह अकेली एयरपोर्ट पर छोडने आई थी
उदास हम दोनों ही थेमुझे तो संतोष था कि इस निष्पाप किसी के सौभाग्य से सजी स्त्री को अपमानित करता अगर छू लेतावह पता नहीं क्या सोच रही थी

लम्बे चुप के बाद वही बोली -

'' नरेश, जब आप आ रहे थे तब बडी दुविधा में थी किकैसे मैं आपको मिलूंगीआप न जाने किस उम्मीद से आ रहे होंगे। पर आपने।''
''
किसी क्लैरीफिकेशन की जरूरत नहीं अनुपमा।''
''
आपने मुझे सहेज लिया। मैं कृतज्ञ हूँ। मैं ने देखा वह पैण्डेन्ट उसके गले में झूल रहा था।''
''
प्रेम का यही रूप स्थायी है। मैं जब भी आउंगा तुमसे मिले बगैर नहीं जाउंगा। तुम ही मेरी एकमात्र आत्मीय, रिश्तेदार, दोस्त या जो भी मानो जो भारत से मुझे सम्पर्क रखवाएगी । तुम मुझे प्रिय हो अपने इसी अखण्डित और सौभाग्य से सजे पवित्र रूप में।''

उसने मेरे हाथों को अपने हाथों में भर लिया और न जाने कितनी देर हम वैसे ही खडे रहते अगर मेरी फ्लाईट का एनाउंसमेन्ट न हुआ होता

''और वह भावनाओं बातों एक से लोगों की एक सी बातों का सम्प्रेषण? ''
''
वह जारी रहेगा कवि।''
''
उत्कर्ष।''
''
हाँ कविता।''
''
कवि''
''
उत्कर्ष''

- अंकुश मौनी
अक्तूबर 14, 2001

कहानी विशेषांक अक्तूबर 2001
इन्द्रनेट पर हलचल - सुब्रा नारायण
अपने अपने अरण्य - नंद भारद्वाज
चिडिया और चील - सुषम बेदी
ठठरी - हरीश चन्द्र अग्रवाल
प्रश्न का पेड - मनीषा कुलश्रेष्ठ
बुध्द की स्वतंत्रता - मालोक
भय और साहस - कनुप्रिया कुलश्रेष्ठ
मदरसों के पीछे - रमेशचन्द्र शुक्ल
महिमा मण्डित - सुषमा मुनीन्द्र
विजेता - सुषमा मुनीन्द्र
विश्वस्तर का पॉकेटमार- सधांशु सिन्हा हेमन्त
शहद की एक बूंद - प्रदीप भट्टाचार्य
सम्प्रेषण - अंकुश मौनी
सिर्फ इतनी सी जगह - जया जादवानी

कहानियों का पूरा संग्रह

  
 

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