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विश्व स्तर का पॉकेटमार आज नताशा बहुत ही खुश थी। एक मामूली वोद्का (रूस में पी जाने वाली एक प्रकार की शराब) बेचने वाले की बेटी (नताशा) ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह एक पर्यटक बनकर भारत आ सकेगी। आज सच में उसकी कल्पना भारत के रेल की पटरियों पर दौड रही थी। नताशा दिल्ली से वाराणसी के सफर पर थी। भारत में उतरते ही उसने सर्वप्रथम वाराणसी जाने का मन बनाया। उसने इसके बारे में काफी कुछ सुन रखा था। जैसा कि आम आदमी को होता है, नताशा भी अपनी कल्पना की दुनिया में खोई अपने बर्थ पर करवटें बदल रही थी। ओह रात्रि के दो बज गए ! घडी पर नजर डालते हुए वह बुदबुदायी। मन ही मन सोचा कि अब सो जाना चाहिए। फिर आँखे मूंद ली उसने। ट्रेन अपने रफ्तार से चली जा रही थी। सुबह 6 बजे वह वाराणसी पहुंच जाएगी। यही सोचे जा रही थी। तभी ट्रेन की रफ्तार कम होने लगी। बर्थ से उतरकर खडी हो गयी वह। शायद कोई स्टेशन आ रहा हो, टॉयलेट भी तो जाना है उसे। सोचते हुए वह दरवाजे की तरफ बढ ग़यी। दरवाजे के पास कुछ लोग नीचे फर्श पर ही बैठे उंघ रहे थे। एक व्यक्ति उसे देखते ही उठकर खडा हो गया। ''अरे भाई जरा मेम
साहब को जाने दो।''
उसने बगल वाले को झकझोरते हुए कहा।
उसकी आवाज पर
लगभग सभी उठ गए।
वास्तव में ट्रेन
किसी स्टेशन पर
पहुँच रही थी।
चलो स्टेशन भी
देख लूंगी।
वह बडबडाते हुए दरवाजे
की तरफ बढने लगी।
ट्रेन धीरे धीरे
रेंगने लगी।
स्टेशन पर काफी भीड थी।
नताशा वाले
डिब्बे से एक दो उतरने वाले थे।
पर चढने वालों की
संख्या ज्यादा थी। नताशा वहीं भीड में फंसी सब कुछ देखे जा रही थी। उसने सोचा उतरने से अच्छा है टॉयलेट ही चला जाए। अगर नहीं चढ पायी तो। ''एक्सक्यूज मी प्लीज ! '' नौजवान नताशा के शरीर से लगता हुआ कम्पार्टमेंट में चढने लगा। उसके पीछे कई यात्री एक साथ चढने का प्रयास करने लगे। नताशा तो भीड में पूरी तरह फंस गयी। वह भीड क़े साथ ही वापस आने लगी। किसी तरह टॉयलेट में आकर दरवाजा बंद किया। चैन की साँस ली। लगभग पाँच मिनट के पश्चात् ट्रेन चल पडी। नताशा भी टॉयलेट से फारिग होकर अपने बर्थ की तरफ चल दी। सभी नए यात्री अपने-अपने बर्थ पर पहुँचकर सामान रखने की या तो उचित व्यवस्था कर रहे थे या बर्थ पर सोने का उपक्रम कर रहे थे। नताशा भी अपने बर्थ पर जाकर लेट गयी। सबसे ऊपर का बर्थ था उसका। अक्टूबर का महीना था। रात में हल्की ठंडक महसूस हो रही थी। नताशा ने अपने बैग से एक चादर निकालकर ओढ लिया। उसे लगा कि अब नींद आ जाएगी। नताशा ने देखा ठीक सामने की (ऊपर के) बर्थ पर भी कोई नया यात्री आकर लेट चुका था। थोडी देर बाद साहब टिकट!
टिकट! किसी ने नताशा का पैर पकडक़र हिलाया।
नताशा को नींद आ
चुकी थी।
वह सहसा उठकर बैठ गयी।काला
लिबास पहने सामने टिकट परीक्षक सामने खडा था।
आँखे मींचते हुए
उसने देखा। मैं खुद पॉकेटमार मेरा पर्स किसने मारा। सोचती हुयी उसने अपने बैग का जिप खोला कि अभी-अभी स्टेशन पर जिसका पर्स मैंने मारा है शायद उसने टिकट लिया हो, और एक पर्स निकाला। पर्स में सही में टिकट पडा था। पर्स मालिक की तस्वीर भी थी उसमें। नताशा ने टिकट परीक्षक की तरफ टिकट बढा दिया। ये उसी नौजवान का पर्स था जिसने स्टेशन पर लोगों को चढने उतरने में सहायता की थी। उधर सामने वाले बर्थ के यात्री की भी स्थिति कुछ इसी प्रकार की थी। उसके पॉकेट से पर्स गायब था। उसे आश्चर्य हो रहा था कि मैं भारत का राष्ट्रीय स्तर का पॉकेटमार और मेरा पर्स किसने मार लिया। उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। इन सारे स्टेशनों पर तो उसी के कारिन्दे पॉकेटमारी करते हैं। आखिर किसकी हिम्मत हुयी उसके पॉकेट पर हाथ साफ करने की। साले एक एक को गोली से भून दूंगा। दांत पीसते हुए उसने मन ही मन सोचा। फिर यह सोचते हुए अपने हैंडबेग का जीप खोलकर एक पर्स निकाला कि अवश्य ही उस विदेशी लौंडिया ने टिकट लिया होगा। ''मैडम योर टिकट इज
रांग।
बर्थ नं
रांग
है और साथ ही यू आर ए
फिमेल।
बट दिस टिकट इज इस्यूड
फॉर मेल।''
टिकट परीक्षक ने बोला। नौजवान ने अपने पास का पर्स
खोला।
उसमें भी एक टिकट पडा था।
उसे पूरी तरह पढा।
वह सामने वाले
बर्थ का था।
उस पर अंकित सूचना के
मुताबिक वह फीमेल का टिकट था।
पर्स को पूरा
सर्च किया।
एक तस्वीर उसमें लगी थी,
जो सामने की विदेशी मैम का था।
सारा माजरा मन ही
मन समझकर उसने दोनों ही टिकट परीक्षक की तरफ बढा दिए।
टिकट परीक्षक ने
दोनों टिकटों को देखा। नताशा हतप्रभ सी सारा मामला समझने की कोशिश कर रही थी। कभी उस नौजवान को कभी उसके हाथ में पडे पर्स को देख रही थी। अभी किसी निर्णय पर पहुंचती कि नौजवान ने पर्स उसके तरफ उछालते हुए कहा ''टेक इट एण्ड गिव मी माई पर्स।'' ''मेरा नाम नताशा है।'' कहते हुए नताशा ने भी जवाब में उसका पर्स उसकी तरफ उछाल दिया। हा हाहा हाहाहाहा ! दोनों एक साथ हँस पडे। ''मेरा नाम जसबीर है।
जस्सू कहते हैं
लोग मुझे।''
हँसी
रोकते हुए नौजवान ने कहा। ''मैं तुम्हें भारत
में अपना दोस्त बना सकती हूं।''
नताशा ने जस्सू से पूछा। फिर ढेर सारी भारत और रूस
के विषय में दोनों ने अपनी अपनी जानकारियां एक दूसरे में
बांटी।
समय कैसे निकल गया।
पता ही नहीं चला।
तभी यात्रियों
में हलचल होनी शुरू हो गयी।
जस्सू ने नताशा
को बताया कि वाराणसी आने वाला है।
नताशा ने घडी
देखा सुबह के 545
होने को थे। नताशा होटल के अपने कमरे में बैठी जस्सू का इंतजार कर रही थी ताकि आज घूमने का प्लान बनाया जा सके। 3 बजे जस्सू होटल में आया। दोनों ने घूमने का पूरा ब्यौरा तैयार किया और निकल पडे। लगातार तीनों दिन जस्सू निश्चित समय पर होटल पहुँच जाता फिर दोनों ही घूमने निकल पडते। नताशा को खूब मजा आ रहा था। वो जस्सू जैसा दोस्त पाकर काफी खुश थी। न जाने क्यों उसे जस्सू में एक अलग ही आकर्षण महसूस हो रहा था। उसे जस्सू ने बताया था। वह अपने माँ बाप की नाजायज औलाद है अत: उसका इस दुनिया में कोई नहीं है। उसे पता ही नहीं कि माँ बाप क्या होता है। परिवार और प्यार का मतलब तो वह जानता ही नहीं था। रात के 12 बजे उसकी नींद अचानक ही खुल गयी। बिस्तर से उठी फ्रीजर से बीयर की बोतल निकाला और बॉलकनी में आकर खडी हो गयी। आज वाराणसी में उसका आखिरी दिन था। चार दिनों में ही इस शहर से वह एक अनजाना आकर्षण महसूस कर रही थी। कल शाम वह दिल्ली के लिए रवाना हो जाएगी। यही सोचकर उसका मन कसैला हो गया। अचानक ही अपने डैड की याद आ गयी। दिन भर वोद्का के नशे में घर के बाहर वाले कमरे में ही वोदका की एक छोटी सी दुकान। घर में माँ नहीं। माँ का नाम भी तो नहीं पता था उसे। हाँ एक आया थी। जो डैड की गुलाम। दिन भर घर का काम करती रहती। रात में डैड की डाँट। कभी कभी पिटाई भी। पर न जाने कौन सी मजबूरी थी कि वो डैड की नौकरी करने को बाध्य थी। दिन भर शराबियों का तांता लगा रहता था। नशे में धुत्त शराबियों के पॉकेट पर हाथ साफ करते करते ही तो नताशा ने यह गुण सीखा था। नताशा का मन सोच रहा था। क्या इसी को परिवार कहते हैं। उसका तो दम घुट जाता था इस माहौल में। वह स्वच्छंद रहना चाहती थी। नहीं चाहिए ऐसा परिवार उसको। आज दिन में उसने कई युवक युवतियों को साथ साथ घूमते हुए देखा था। कितने प्यारे लग रहे थे वो। क्या मेरा भी कोई हमसफर हो सकता है इस दुनिया में। सोचते सोचते उसका मन जस्सू पर टिक गया। कितना अच्छा है जस्सू। उसका कितना ख्याल रखता है। बहुत ही दिलचस्प है। किसी न किसी बात पर हँसने की बात कर देता है। अगर इसका साथ मिल जाए तो पूरी जिन्दगी मजे से निकल सकती है। फिर दोनों का व्यवसाय भी तो एक ही है। फिर बिस्तर पर आकर लेट गयी। सोचते सोचते कब आँखे बंद हो गयीं पता नहीं। दरवाजे की घंटी की आवाज ने उसे जगा दिया। घडी पर नजर डाली तो सुबह के 7 बज चुके थे। दरवाजा खोला तो जस्सू खडा मुस्कुरा रहा था। ''कितने बजे की गाडी
है नताशा! '' जस्सू ने सोफे पर बैठते हुए पूछा। फिर काफी देर तक दोनों ही बातें करते रहे। नताशा ने कुछ शापिंग की इच्छा जाहिर की। फिर दोनों ही निकल पडे। शाम को दोनों ही ट्रेन से भारत भ्रमण पर निकल पडे। महीनों घूमते रहे। पैसे की कमी तो थी नहीं। जब भी कमी महसूस होती, दोनों का व्यवसाय साथ साथ रंग लाता। इसी बीच कब प्यार का अंकुरण हो गया यह पता ही न चला। एक दिन दोनों रामेश्वरम् में समुद्र के किनारे बैठे थे। नताशा जस्सू के गोद में अपना सिर रखकर लेटी हुयी थी। ''जस्सू ! मैं सोचती
हूँ
कि हम दोनों की मुलाकात
बहुत ही अनोखे ढंग से हुयी है।
और इतने दिनों
में हम कितने करीब हो गए हैं।
है ना।''
नताशा ने कहा।
''मैं
तुमसे बहुत प्यार करने लगी
हूँ।
समझ में नहीं आता रूस
जाकर कैसे रह
पाऊंगी। सोचकर ही
डर लगता है।
तुम क्या सोचते हो।
बोलो न जस्सू।''
नताशा ने उसे कुरेदते हुए कहा। नताशा सुनते ही खुशी से पागल हो गयी। जस्सू के सीने से चिपट गयी। जस्सू ने भी अपने होठ उसके होठों पर रख दिए। दोनों की सांसों की गर्माहट एक दूसरे में उतरने लगी। काफी देर तक दोनों ऐसे ही पडे रहे। नताशा को लगा कि सारी दुनिया यहीं सिमटकर रह गयी है। फिर धीरे से दोनों एक दूसरे से अलग हो गए। ''हमारी शादी में एक
बहुत बडी आश्चर्यजनक
बात है।'' अब दोनों की मस्ती दुगुनी हो गयी। यहाँ वहाँ घूमते अब गृहस्थी बसाने का उपक्रम होने लगा। नताशा के कहने पर ही जस्सू ने वाराणसी में एक मकान लिया और रहने लगा। समय गुजरने लगा। वह समय भी आया कि नताशा के पैर भारी हुए। दोनों का बेसब्री से विश्वस्तर के पॉकेटमार का इंतजार था। वह समय भी आया जब नताशा हास्पिटल में दाखिल हुयी। जस्सू के खुशी का ठिकाना न था जब नर्स ने बताया कि नताशा ने लडक़े का जन्म दिया है। दोनों की मुरादें |