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पंचकन्या - 10

बहुत पहले 1887 में बंगला के महान साहित्यकार बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने द्रौपदी और सीता के बीच विशेषताओं को स्पष्ट किया था पहली वाली सीता जो कि मुख्यत एक पतिव्रता पत्नी थी और उसमें कोमल स्त्रियोचित गुण थे जबकि बाद वाली द्रौपदी गौरवमयी और आश्चर्यजनक रूप से क्षमतापूर्ण रानी थी जिसमें स्त्री की लौह इच्छाशक्ति गौरव और तेजोमय बुद्धिजीविता प्रमुख रूप से उपस्थित थी और वह शक्तिशाली भीम की उपयुक्त सहचरी थी। उन्होंने यह उल्लेख भी किया है कि द्रौपदी में स्वहीन होकर अहम् त्याग कर अपने गृहस्थी सम्बन्धित कर्तव्य दोषरहित होकर और बिना किसी मोह के निभाने का गुण है और इस तरह वह स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम है। उसमें वे गीता के अपनी इन्द्रियों पर अपनी उच्च क्षमताओं द्वारा संयम रखने के उपदेशों का उदाहरणस्वरूप पाते हैं। जैसा कि एक पत्नी का कर्तव्य होता है कि अपने पति को एक पुत्र दे उसने हर पाण्डव को एक एक पुत्र प्रदान किया किन्तु अधिक नहीं यह अपनी इन्द्रियों पर विजयप्राप्ति का उदाहरण है जैसा कि कुन्ती ने किया था जब एक बार कर्तव्य पूरा हुआ उसके बाद उसके और पाण्डवों के बीच कोई दैहिक संसर्ग नहीं ॐ

इसीलिये पांच पतियों के होते हुए द्रौपदी ने अपनी पवित्रता अक्षुण्ण रखी। अपने सखा कृष्ण की निकट मित्र थी वह और उनकी ही भांति कमल सदृश पूर्णत चेतना के संसार में रही मगर कभी इसमें डूबी नहीं। उसके अद्वितीय व्यक्तित्व के प्रस्फुटन की सुगन्ध दूर दूर तक फैल गई वह उस कीचड़ से ऊपर उठी रही जिसमें उसकी जड़ें थी।

अन्तत:सत्य यही है कि द्रौपदी अपने पतियों से अलग थी जो कि उसे गर्व से ब्याह कर घर लाये थे उनमें से कोई भी यहां तक सहदेव जिसका उसने अपने मातृत्वभाव विशेष ध्यान रखा और उसका प्रियस्व अर्जुन भी नहीं रुका उसके लिये जब वो हिमालय की घाटियों से नीचे गिर जाती है और मरणासन्न लेटी होती है नाथवती अनाथवत। यहीं आकर हम महसूस करते हैं कि इस उल्लेखनीय चरित्र वाली 'कन्या' ने कभी अपने लिये कुछ नहीं मांगा। अनचाही सन्तान के रूप में जन्मी अचानक बहुपति विवाह में धकेल दी गई ऐसा लगता है कि वह भलीभांति जानती थी कि वह एक उपकरण मात्र है एक जीर्ण शीर्ण काल की समाप्ति और एक नया युग जन्म लेने के लिये। और इस तरह अवगत होने की वजह से यजनासनी ने अपना सम्पूर्ण स्व त्याग की अग्नि में होम कर दिया जिसके लिये कृष्ण मुख्य देवता थे। यह अपने निम्नस्तर के 'स्व' को ऊपर उठाने का गुण और स्वयं को ऊंचे उद्देश्यों के लिये उपकरण या माध्यम बना लेना इन सदा स्मरण की जाने वाली कुमारियों में एक जैसा है। इन्हें प्रतिदिन स्मरण कर इनसे यह सीख कर कि किस तरह अपने क्षुद्र अहम को त्याग अपने निम्न 'स्व' से उठ कर अपने उच्च 'स्व' तक पहुँचा जाए हम अपने पाप से उबरते हैं।

ये कुमारियां आदिकालीन आर्केडियन देवी के तीन स्वरूपों के समानान्तर हैं  हेरा  - कुमारी संतुष्ट और दुखित: । हेरा भी जो कि केनाथोज़ के झरनों में नहा कर नई कन्या के रूप में उभरी थी। हेरा की ही तरह उसकी पुत्री हेबे और डीमीटर भी, कोर परसेफोने थी वैसे ही सत्यवती कुन्ती और द्रौपदी। डीमीटर नेमेसिस और परसेफोने, जुगुप्सा जगाने वाली क्वीन ऑफ हेडस जिसे देख कर डर और प्रशंसा दोनों के भाव जागते थे की तरह ही द्रोपदी श्यामवर्णा थी। श्यामवर्णा देवी कन्या वीर शक्ति जिसकी प्रतिमाएं आज भी दक्षिण भारत में मिलती हैं मां काली का प्रतिरूप युद्ध में भयावह पहले ही से वश में न होने वाली प्रकृति का विनाशक स्वरूप।

द्रौपदी भी हेलेन की तरह ही है जो कि आकाशवाणी के साथ अवतरित हुई थी कि वह योद्धाओं का विनाश करेगी। द्रौपदी डीमीटर और हेलेन की तरह ही थी जिनका सम्बन्ध विनाश और हिंसा से रहा उसके स्वयंवर का अन्त भी झगड़े के साथ हुआ एक पंचस्तरीय विवाह उस पर थोपा गया उसके साथ राजसभा में दो बार अपमानजनक व्यवहार किया गया जयद्रथ और कीचक ने उसके साथ बलात्कार करना चाहा  के पुत्रों ने उसे जला कर मार देना चाहा। प्रतिशोध से भरी डीमीटर और हेलन की भांति द्रौपदी ने स्वयं जयद्रथ और किचका को जाने अनजाने आकर्षित किया फिर प्रतिशोध लिया। प्रतिशोध पूर्ण अम्बा भी ऐसी ही स्त्री थी जिसके आत्मदाह की लपटें उसके आन्तरिक क्रोध को प्रकट करती हैं और वह दुबारा जन्म लेती है और अपने नारीत्व के अपमान का बदला रक्त से लेती है और रणभूमि में भीष्म की मृत्यु का कारण बनती है। द्रौपदी भी मूलत: एक युद्ध की कुमारी देवी है आर्टेमिस और एथेने की ही तरह ही।

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पंचकन्या
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