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वनगन्ध-5

मानसी के फाइनल एग्ज़ाम्स शुरू होने को थे।  मेरे इन्टरव्यूज हो चुके थे।  परिणाम अपेक्षा के अनुरूप रहा और मेरा चयन अपने ही शहर के कॉलेज में हो गया था असिस्टेन्ट लैक्चरर के पद पर।  पापा का रिटायरमेन्ट करीब था, पापा ने अपना घर बनवाना आरंभ कर दिया था, जीवन भर इसी शहर में अध्यापन किया, लोगों का स्नेह व सम्मान पाया और अब यहीं रहने का मन बना चुके थे वे।  दीदी की शादी हो चुकी थी और सही समय पर मैं मम्मी-पापा के साथ रहने आ गया था।  मुझे याद है मेरी उस नौकरी का पहला दिन

मण्डल आयोग की तीखी प्रतिक्रियाओं का असर हर कॉलेज-यूनिवर्सिटी पर पडा था, मानसी का कॉलेज में एक निश्चित अवधि के लिए क्लासेज बन्द हो चुकी थीं और वह घर लौट आई थी
।  यही हाल मेरे कॉलेज का भी था, पर कार्यालय खुले थे और लैक्चरर्स आकर साईन करते कुछ देर देश की स्थिति पर विमर्श करते और लौट जाते।  बस ऐसे ही माहौल में मैंने अपना पदभार संभाला था

उस दिन वह सुबह-सुबह चली आई थी
।  मैं उठा ही था और तैयार होने जा रहा था
उस साधारण से दिन को मानसी ने खास बना डाला था
।  मम्मी ने पूजा करवाई मानसी ने दही-पेडा खिलाया और अच्छा सा नाश्ता करवा कर विदा किया।  शाम खूब गहमा-गहमी थी घर में।  धीरे-धीरे मेरे मित्रों और परिचतों से घर भर गया।  मानसी और मम्मी किचन में व्यस्त थे।  और वह शाम एक अच्छी-खासी और बहुत अपनेपन से भरी पार्टी में तब्दील हो गई थी।  वैसा आयोजन तो मेरे आई एफ एस में सलेक्शन पर भी न हुआ

जितने दिन वह
वहाँ थी, हर शाम मेरे साथ होती।  कभी मैं और मानसी शहर से बाहर उस लम्बी नहर के किनारे जा बैठते, कभी मिलिन्द हमारे साथ होता तो हम पिक्चर देख आते।  एक दिन हमने गुलजार द्वारा निर्देशित  इजाज़त  देखी।  जाने-अनजाने हमारे जीवन की परिधियाँ छूकर गुजर गई वह कहानी।  उसकी नायिका  'माया' एक बिखरे घर की बेटी थी।  शादी के नाम से उसे चिढ थी और वह नायक महेन्दर जो एक फोटोग्राफर था उसके साथ बस समानान्तर चलते रहना चाहती थी।  उसे कविताएं और बरसात पसन्द थी।  महेन्दर पर परिवार की ओर से विवाह का दबाव था और उसे सुधा से शादी करनी पडती है क्योंकि लाख समझाने पर भी माया शादी करने को तैयार नहीं होती है और यायावरी सी जब चाहे तब गायब हो जाती है।  उस पिक्चर में मानसी ही नहीं मैं भी दो-एक बार आँसू पौंछ रहा था।  माया मानसी हो तो हो हाँ स्वर्णा सुधा सी ही बेहद सन्तुलित, व्यवहारिक और केलकुलेटिव जरूर है

उन दिनों मेरी भी शादी का प्रश्न आखिरकार उठ ही गया घर में, वह भी मानसी के समक्ष
।  मैंने उसके चेहरे पर खेद का एक नन्हा सा सूत्र पकड ही लिया फिर भी वह मम्मी के ही सुर में सुर मिला कर बोली,'' बताओ न, कैसी लडक़ी ढूंढे? ''
मैंने भी उसे चिढाने के लिए कह दिया, ''साँवली बडी-बडी आँखों वाली, लम्बे बालों वाली रेखा जैसी लडक़ी जिसकी लम्बाई हाँ मिनी जैसी हो।''

अब उसके चेहरे परर् ईष्या का भाव था, फिर भी वह हँस रही थी।  पर सच तो ये था मिनी का पर्याय ही मेरी पसंद बन गई थी।  साफ पारदर्शी त्वचा, गोल चेहरा, ब्लंट कटे लहराते बाल, शहद के रंग की छोटी गोल आँखे, ग्रीक नोज और खूबसूरत होंठ

उसी शाम मम्मी-पापा घर में नहीं थे, वांछित एकान्त पाकर मैं उससे पूछ रहा था कि -

''भविष्य का क्या करें? ''
''
हमारे हाथ क्या है? ''
''
चाहें तो सब कुछ हमारे ही हाथ हो सकता है।''
''
नहीं।  अभी तो संभव नहीं।''
''
मेरे पास वक्त कम है मिनी... ''
''
तो आप शादी करलो, और न चाहो तो मेरे साथ ऐसे ही रहो।''
''
कब तक? ''
 ''जब तक ऊब न जाओ।''

हर बार शादी की बात पर मिनी का यही रुख रहता, जानता था मानसी को मम्मी-पापा के लिए बहू के रूप में स्वीकार करना लगभग असम्भव ही होगा।  जातिगत भेद को छोड भी दूँ तो संस्कारों में जमीन आसमान का अन्तर।  कहाँ विशुध्द सनातनी संस्कारों वाली मेरी माँ, कहाँ मानसी के घर में कोई भगवान की तस्वीर तक नहीं थी।  न दीपावली को लक्ष्मी पूजन होता न होली पर कोई पूजा।  उसपर टूटते-टूटते बचे घर की लडक़ी को अपनाने के प्रति गहरा असंतोष।  यूँ भी कोई मेरे और मिनी के बीच ऐसी बात सोचता तक न था, जहाँ तक मैं और मिनी सोच रहे थे।  फिर भी मैं एक हल चाहता था।  इस सम्बन्ध को कोई सुखद आकार देना चाहता था।  पर यहा एक व्यूह था जिसका कोई हल आसान न था।  मुझे बार-बार अपनी गलती का अहसास होने लगा था, एक बार फिर वही बात उठी और मैंने मानसी से फिर कहा -

'' अब हमें निर्णय लेना होगा, अन्यथा अधिक साथ न चल सकेंगे।  या तो विद्रोह कर हम अपने आप को सुखी कर लें, या मम्मी पापा के लिए अपने रास्ते बदल लें, तुम अच्छी तरह पढ क़र अपना कैरियर बनाओ और किसी बेहतर इन्सान से शादी करके बस जाओ।  तुम्हारे जीवन के फैसले अब तुम्हारे हाथ हैं।''

बहुत देर वह चुप रही फिर बिखर गई, '' ...... कौनसी पढाई, कैसा कैरियर और कौनसे फैसले? मेरा तो इस जीवन में ही विश्वास न था, कुछ विश्वास था भी तो आपके होने में, आपके अस्तित्व में। आप इतने कुछ हैं मेरे लिए कि आपको पाने का स्वप्न तक देखने से मैं कतराती हूँ।  आप महीनों नहीं मिलते मुझसे पर कहीं वह स्नेह का सूत्र क्षीण नहीं होता, हम फिर से उतनी ही आत्मीयता से मिलते हैं।  हम स्थाई तौर पर साथ रहें इसकी सम्भावनाओं में जलजले छिपे हैं और ऐसी नींव पर मैं कैसे अपना और आपका जीवन रख दूँ? ये भी जानती हूँ आपसे अलग होकर जीना ही व्यर्थ होगा।  पर क्या हल सुझाऊं , मैं स्वयं नहीं जानती।''
 ''किसका विश्वास और किसके अस्तित्व में? मैं क्या मैं रह पाऊँगा तुम्हें खोकर? ''

उसे कस कर मैंने अपने वक्ष से बाँध लिया था मैं ने।  अगले दिन वह जयपुर लौट गई उसके कॉलेज खुल गए थे।  सैमेस्टरों, इम्तहानों का रुका हुआ सिलसिला फिर शुरू हो गया।  लम्बा अन्तराल हमने पत्रों से पाटने का प्रयास किया।  उसके इम्तहान जैसे मेरे इम्तहान होते क्योंकि यही एक साल उसके कैरियर के लिए महत्वपूर्ण साल था और मैं उसे मिलता न मिलता लेकिन उसे सफल व्यक्ति के रूप में देखना चाहता था।  मैं उसे लम्बे पत्र लिखता, जिनका कि वह आग्रह करती थीक्या आप भी ना! दो लाईन के लैटर से ही बस काम चला लेते हो

मैं लिखता -
आज सुबह
पाँच बजे नींद खुल गई और उठते ही याद आया पेपर होगा तुम्हारा।  मन ही मन शुभकामनाएं प्रेषित कीं।  भगवान ने अगर मेरी सुन ली तो प्रथम स्थान तुम्हें ही मिलेगा।  बस अब इस आखिरी साल के सारे इम्तहान जोर लगा कर दे दो, और लैक्चरर बनने का मेरा सपना पूरा कर दो

इस उबड-ख़ाबड रास्ते पर हम दोनों हमेशा साथ चले हैं
।  गिरते-पडते, साथ-साथ ठोकरें खाते हम सुरक्षित बिन्दु पर बस पहुँचने वाले हैं।  मेरे भी आई एफ एस के एग्जाम की डेट्स आगई हैं।  मेरा तो मन कम था पर पापा और तुम्हारा प्रेरणाएं हैं जो मैं इस बेहतर लक्ष्य के लिए तैयारी कर रहा हूँ।

एक दिन दूरदर्शन पर मुशायरा आ रहा था पापा सुन रहे थे, एक शेर याद रह गया था, तुम्हें लिखता
हूँ।

'' मैं चाहता हूँ दुनिया, वह चाहता है मुझे
मसला बडा नाज़ुक है, कोई हल लिख दे।''

रणथम्भौर चलोगी छुट्टियों में? तुमने अपने और मैंने अपने फाईनल इम्तिहान अच्छे से किए तो यह ट्रीट हम दोनों का इन्तजार कर रही है।  दुबली हो गई होगी, पढ क़र नहीं मुझसे अलग होकर।  खुद भी पत्र संक्षिप्त लिखा करो और मुझसे भी लम्बे पत्रों की उम्मीद मत किया करो।  तुम्हारे अच्छी भाषा से सजे पत्र मुझे प्रिय हैं पर मैं मन को मना लूंगा, बस तुम मन लगा कर पढो और इस लक्ष्य को साध लो

हम दोनों ने अपने-अपने पर्चे पूरे प्रयास से अच्छे किए, हम रणथम्भौर भी गए, जहाँ तक मेरा मन जानता था कि यह हमारे अलगाव से ठीक पहले का अंतिम बेहद खुशनुमा वक्त है, और इसे हाथ से फिसल जाना ही है, वहीं वह बेखबर सी उतनी ही खुश और उच्छृंखल थी जितना वह ऐसे प्राकृतिक वातावरण में और मेरे सान्निध्य में हो जाती थी।  मैं इसे यादगार बना देना चाहता था

स्वतन्त्र विचरते बाघों के अद्भुत दृश्य, ऊष्ण कटिबन्धीय रणथम्भौर के इस वन अभयारण्य के रंग बडे अलग थे
।  तीखी गर्मी के बीतते दिन थे, एकाध हल्की बरसात हो चुकी थी सो कंटीली झाडियों, पीले पेडों, भूरी घास के धूसर रंगों के बीच से हरीतिमा झाँकने लगी थी।  अभयारण्य के बाहर हम एक गेस्टहाउस  झूमरबावडी  में ठहरे थे, जिसे हम हँस कर झूमरीतलैया कहते थे।  राजपुताना स्थापत्य के इस भवन के कमरों में बडे प्यारे छोटे-छोटे झरोखे थे, जिसके बाहर एक पेड पर लाल काला कठफोडवा रहता था जिसकी व्यस्त ठक-ठक भरी दोपहर में हमारी कच्ची-पक्की नींद तोड ज़ाती थी।  मानसी याद होगा तुम्हें? और वह अलमस्त बाघिन? जो इस कदर मदमस्त थी कि वह पतली-पतली पगडंडियों पर अपनी व्यग्रता को चिन्हित करती चल रही थी और अचानक हमारी जीप के आगे बैठ गई थी।  उसे छेडने की हिम्मत किसे थी? और जीप को उस संकरे रास्ते पर मोडा भी कहाँ जा सकता था? वह तो भला हो उस बाघ का एक घन्टे बाद जिसकी उतनी ही मादक हुंकार ने उसे उठने पर विवश किया और वह उसी दिशा में बढ चली जिधर से वह हुंकार उठी थी।  तुम कितनी चकित थीं प्रेम के इस नितान्त प्राकृतिक रूप से

वहीं उस हजारों साल पुराने बरगद की जमीन को छूती शाखाओं पर बैठ हमने फिर भविष्य की व्याख्या की।  तुमने मेरी हथेलियों पर शून्य बना दिया था।  उसी शाम उस झील के किनारे टहलते हुए सारस का एक जोडा एक दम हमारे सर पर से फडफ़डाता गुजरा था

तुमने कहा था ,  '' निखिल, सारस एक ऐसा पक्षी है न जो कभी अपना जोडा नहीं बदलता''

मैं प्रश्न की भावुकता से तत्काल ही संक्रमित हो गया था और वही कर बैठा था जो एक भावुक प्रेमी कर सकता था

'' मुझसे शादी करलो मानसी ! ''

तुम्हें विश्वास नहीं हुआ था एकाएक, क्योंकि इस बात को मैं हमेशा या तो टालता था या तुम्हारे भविष्य के प्रति आशंकित होकर ही कहता था कि  अगर इससे तुम्हारा जीवन बनता हो तो और तुम मेरे शहीदाना भाव को समझ कहतीं  ना! क्या फायदा।  पहली बार मैंने हृदय से कहा था।  तुम्हारे नेत्र विस्फारित हो मुझ पर आ टिके थे।  मैंने प्रश्न दोहराया नहीं तुमने कुछ कहा भी नहीं

हम मिलते रहे, हमारे आधारहीन सम्बन्ध स्वप्निल हो गए थे
।  कुछ दिनों के लिए उस भ्रम की नदी में मैं भी बह चला।  एक बत्तीस वर्षीय पुरूष किशोर बन सोचने लगा था कि लड लूंगा दुनिया से मानसी के लिए।  इस उन्माद में उसे भी आशाएं बँधा दीं जिसने पहले ही मान लिया था कि हमारे प्रेम का भविष्य शून्य है

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